Historyसरहुल पर्व का महत्त्व और इतिहास | Sarhul Parv

सरहुल पर्व का महत्त्व और इतिहास | Sarhul Parv

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सरहुल पर्व का महत्त्व और इतिहास :- झारखंड राज्य एक प्रकृति उपासक और पूजक राज्य है, यहां सभी प्रकृति से जुड़े चीज़ों की भगवान के रूप में पूजा की जाती है। सरहुल पूजा भी प्रकृति से जुड़ा हुआ पर्व है इसमें साल ( सखूवा ) के पेड़ की पूजा की जाती है।

यह पूजा खास कर आदिवासियों का सबसे बड़ा पर्व है। लेकिन इस पर्व को सिर्फ़ आदिवासी ही नहीं बल्कि झारखण्ड के सभी लोग भी बड़ी आस्था और विश्वास के साथ मनाते हैं।

Table of Contents

सरहुल पर्व (Sarhul Parv) कब मनाया जाता है?

सरहुल पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के तृतीया दिन से मनाया जाता है। इस समय बसंत ऋतु चल रहा होता है जिसके कारण पृथ्वी के सभी पेड़ – पौधे में नए – नए फूल – पत्ते से भर जाते हैं। इस समय पूरी पृथ्वी रंग – बिरंगे रंगों से सजी हुई रहती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति ने धरती का श्रृंगार किया हो।

हमारे देश में बसंत ऋतु को खुशियों का संदेश माना जाता है, क्योंकि इस पुरी पृथ्वी में एक नये उमंग का संचार होता है। सभी के घर फसलों से और जंगल फलों और फूलों से भर जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस समय प्रकृति अपने गोद में बसे किसी जीव – जंतु को भूखा नहीं रहने देती है। सरहुल नए साल का शुरुआत का प्रतीक है, इस पर्व को मनाने के बाद ही आदिवासी – मुलवासी समुदाय के लोग पेड़ – पौधे में आए नए फल – फूल – पत्तियों का सेवन करते हैं।

सरहुल पर्व पर मछली और केकड़ा का क्या महत्व है?

सरहुल पूजा के ठीक एख दिन पहले मछली और केकड़ा पकड़ने का रीति – रिवाज है, इसको घर के दामाद या बेटा पकड़ कर अपने घर लाते हैं और उसे पूजा वाले स्थान में आरवा धागा से बांध कर टांगा दिया जाता है। धान बुआई के समय मछली और केकड़ा के चूर्ण को गोबर के साथ मिलाकर बिहन गाड़ी (जिस जगह धान बोया जाता है) में छितरा दिया जाता है।

यह मान्यता है कि जिस तरह केकड़े और मछली के असंख्य बच्चे होते हैं ठीक उसी तरह धान की बालियां भी असंख्य होंगी। पौराणिक कथाओं के अनुसार मछली और केकड़ा पृथ्वी के पूर्वज है। समुन्द्र के मिट्टी को ऊपर लाकर ही हमारी पृथ्वी बनी है, जिसका प्रयास मछली और केकड़ा ने भी किया था। इसीलिए सरहुल का पहला दिन उनके सम्मान के लिए समर्पित होता है।

सरहुल पर्व (Sarhul Parv) कैसे और क्यों मनाया जाता है?

सरहुल पूजा के पूर्व संध्या से पूजा के अंत तक पाहान उपवास करता है। पूजा के एक सप्ताह पहले ही गाँव की “डाड़ी/चूआं (एक तरह का छोटा कुआं)” की साफ – सफाई की जाती है तथा उसके ऊपर ताजा सखुवा की डालियों को काट कर डाल दिया जाता है, जिससे पक्षियाँ और जानवर वहाँ से जल न पी सकें और ये जल बिलकुल शुद्ध रहे।

सरहुल पर्व का महत्त्व और इतिहास

पूजा के दिन भोर में ही यानि मुर्गा बांगने के पहले ही पहान दो नये घड़ों में “डाड़ी/चूआं ” का शुद्ध जल भर कर बिना किसी से बात किए सबकी नजरों से बचाकर गाँव को रक्षा करने वाली सरना मां के चरणों में रखता है। फिर सुबह में गाँव के नवयुवक सांढ़ा (मुर्गा) लेकर आते हैं, इन सभी मुर्गों का रंग नियम के अनुसार अलग-अलग होते हैं।

सृष्टिकर्ता सिंग बोंगा के लिए – सफ़ेद मुर्गा, हातु बोंगा (ग्राम देवता) के लिए – लाल मुर्गा, इकिर बोंगा (दरहा – देशाउली) के लिए – माला मुर्गा, भूत – प्रेत के लिए – काला मुर्गा और हड़म बूढ़ी (पूर्वजों) के लिए – रंगीली मुर्गे का बलि दी जाती है।

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गांव के पाहान सरना पूजा स्थल में बैठकर पूजा करते हैं। गाँव के पाहान के सहयोगियों द्वारा पासवान के माथे पर सिंदुर का तिलक लगाया है, उसके बाद पानी के घड़ा को पाहन देख कर बताते हैं कि इस साल कैसी बारिश होगी। ठीक उसके बाद सभी लोग “बरसो-बरसो” कहकर शोर करते हैं, बोला जाता है कि यह धरती और आकाश के बीच शादी का प्रतीक है।

पूजा में पाहान एक – एक करके सारे मुर्गों को बलि चढ़ते हैं। पहान सखूआ/सरई गाछ को सिंदुर लगाता और अरवा धागा से तीन बार लपेटता है, जो शादी के वस्त्र देने का प्रतीक है। सभी मुर्गे का खिचड़ी बनाया जाता है, जिसे “मुर्गा खिचड़ी” कहते हैं। खिचड़ी तथा हड़िया परसाद के रुप में वहां उपस्थित सभी लोगों को बांटा जाता है।

वहां उपस्थित सभी लोग साल फूल के छोटी – छोटी डालियां अपने – अपने घर ले जाते हैं और उसको दरवाज़ा में लगा देते हैं। फिर सभी लोग शाम में सरना स्थल के आखाड़ा में ढोल – नगाड़े – मंदार के साथ जमा होते हैं और रात भर नाच – गान का माहौल बना रहता है। तीसरे दिन पाहान के द्वारा फुलखोंसी का कार्यक्रम चलाया जाता है, जिसमें पाहान गांव के प्रत्येक घर जाकर सभी को सरई फूल कान में और माथा पर सिंदुर का टीका लगता है।

फिर शाम में विसर्जन जुलूस निकाला जाता है, जिसमें सभी कोई नाचते – गाते निर्धारित स्थान में जाते हैं उसके बाद नजदीकी तालाब, नदी में सभी पूजा सामग्री को प्रवाहित कर दिया जाता है। चौथे दिन के शाम को सभी आखाड़ा स्थल में आकर आखाड़ा मिटाने के नाम से नाच – गान करके त्योहार समाप्ति की घोषणा किया जाता है।

सरहुल पर्व (Sarhul Parv) में सरई फूलों का प्रयोग क्यों किया जाता है?

सरहुल प्रकृति से जुड़ा हुआ एक बहुत बड़ा पर्व है, जिसमें मुख्य रुप से साल/सरई के पेड़ को पूजा किया जाता है। आदिवासियों का मानना है कि इस पर्व को मुख्य रूप से सरई फूलों के साथ मनाया जाता है। पतझड़ के मौसम में पेड़ों के टहनियां पर नए – नए पत्ते और फूल खिलते हैं। इस दौरान साल के पेड़ों पर खिलने वाले फूलों का विशेष महत्व है। यह पर्व मुख्यतः 4 दिनों तक मनाया जाता है, जो चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया से प्रारंभ होता है।

सरहुल पर्व का महत्त्व और इतिहास

सरहुल दो शब्दों से मिलकर बना है :- सर और हूल जिसे अंग्रेजी में andlsquo और andrsquo कहते हैं। जिसमें सर का अर्थ है:- सरई फूल और हूल का अर्थ है क्रांति, इसका मतलब सरई फूलों की क्रांति को सरहुल कहा गया। झारखंड के आदिवासी-मूलवासी के जन – जीवन में साल/सखुआ पेड़ की अति महत्त्व है। सरई की पत्ती, टहनी, डालियाँ, तने, छाल, फल, फूल आदि सब कुछ प्रयोग में लाए जाते हैं। सरई पत्तियों का उपयोग पत्तल, दोना, पोटली आदि बनाने में होता है।

साथ ही दातवुन, जलावन, मड़वा-छमड़ा, शादी-बिहा, भाग्य देखने आदि में सखुए की डाली, टहनी, पत्ता, लकड़ी का उपयोग किया जाता है। इसका उपयोग के बिना आदिवासी – मूलवासी का जन- जीवन की कल्पना करना लगभग असम्भव-सा है। आदिवासी – मूलवासी के जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु के बाद भी सरई पेड़ का विशेष स्थान है। पारखी मीकर रोशनार के द्वारा लिखा गया पुस्तक “द फ़्लाइंग हॉर्स ऑफ धर्मेस” जिसमें आदिवासी जनजीवन और खानपान के ऊपर है। सरई का पेड़ आदिवसियों के लिए सुरक्षा, शांति, खुशहाल जीवन का प्रतीक माना गया है।

सरहुल को किस-किस भाषा में क्या-क्या बोला जाता है?

सरहुल पर्व को झारखण्ड के अलग -अलग भाषा में इन नामों से जाना जाता है :-

भाषापर्व का नाम
मुण्डारी बा या बाहा
संथालीबा या बाहा
कुड़ुखखद्दी या खे़खे़ल बेंजा
खड़ियाजोनकोर
पंचपरगनियासरहुल
कुड़मालीसरहुल
खोरठासरहुल
नागपुरीसरहुल

सरहुल में हड़िया का क्या महत्व है?

सरहुल पुजा के लिए आदिवासी समाज के प्रत्येक घर से हड़िया बनाने के लिए 3-4 दिन पहले ही चावल जमा किए जाते हैं ताकि पूजा के दिन से हड़िया पूरी तरह से बनकर तैयार हो जाए। यही हड़िया पूजा के दिन सबसे पहले सरना मां को चढ़ा कर फिर सबको परसाद के रूप में दिया जाता है।

सरहुल कौन समुदाय के लोग मानते हैं?

सरहुल पूजा खास कर आदिवासियों का सबसे बड़ा त्यौहार है। लेकिन इस पर्व को आदिवासी समुदाय के लोगों के आलावा झारखण्ड सभी मूलवासी लोग भी बड़ी धूम – धाम से मानते हैं।

सरहुल में पूजा कौन करता है?

गांव के मुख्य पाहान के द्वारा सरहुल पूजा किया जाता है। सभी धार्मिक अनुष्ठान पहान के द्वारा संचालित किया जाता है।

सरहुल में लाल और सफ़ेद रंग का क्या महत्व है?

झारखंडी भाषा-संस्कृति के प्रति अभिमान पैदा करनेवाले डॉ रामदयाल मुंडा के द्वारा कहा गया कथन – “जे नाची से बांची” यानि जो नाचेगा वही बचेगा क्योंकि नृत्य ही संस्कृति है। सरहुल पर्व में पूरे झारखंड में जगह-जगह नाच गाना का माहौल होता है, जिसमें सभी लोग झूमते गाते रहते हैं।

इस पर्व में लड़की तथा महिलाएं लाल पाढ़ साड़ी पहनती हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि सफेद रंग पवित्रता और शालीनता का प्रतीक, वहीं लाल रंग संघर्ष का प्रतीक माना जाता है। सफेद रंग आदिवासियों का सर्वोच्च देवता सिंगबोंगा और लाल रंग बुरुबोंगा का प्रतीक है। यही कारण है कि सरना झंडा का रंग भी लाल और सफेद ही होता है।

मुंडारी में एक कथन है – ” सेनगे सुसुन, काजिगे दुरंग ” जिसका अर्थ – चलना ही नृत्य और बोलना गीत है, यही आदिवासियों का जीवन है। झारखंड के सभी लोग बहुत ही सीधा – साधा और मेहनती होते हैं, ये लोग किसी के वश में रहना नहीं जानते हैं।

सरहुल पर्व में प्रयुक्त कुछ प्रतीकों पर गौर किया जाए तो आपको पता चलेगा कि आदिवासियों की प्रकृति प्रेमी, अध्यात्मिकता, सर्वव्यापी ईश्वरीय उपस्थिति का एहसास, ईश्वरीय उपासना में सृष्टि की सब चीजों, जीव- जन्तुओं आदि का सामंजस्यपूर्ण सहअस्तित्वा का मनोभाव निखर उठता है।

मुंडारी समाज के लोग बहा पोरोब में क्या करते हैं?

मुंडा समाज में बहा पोरोब का विशेष महत्व है। मुंडा लोग प्रकृति के पुजारी हैं। सखुआ या सरजोम वृक्ष के नीचे मुंडारी खूंटकटी भूमि पर मुंडा समाज का पूजा स्थल सरना होता है। सभी धार्मिक नेग नियम इसी सरना स्थल पर पाहान द्वारा संपन्न किया जाता है।

जब सरई पेड़ की डालियों पर सरई फूल भर जाते हैं, तब गांव के लोग एक निर्धारित तिथि पर बहा पोरोब मनाते हैं। बहा पोरोब के पूर्व से पाहान पुजार उपवास रखता है। यह पर्व विशेष तौर पर पूर्वजों के सम्मान में मनाते हैं, धार्मिक गति विधि के अनुसार सबसे पहले सिंगबोगा परम परमेश्वर को फिर पूर्वजों और ग्राम देवता की पूजा की जाती है। पूजा की समाप्ति पर पाहन को सरहुल गीत गाते हुए नाचते-गाते उसके घर तक लाया जाता है।

क्या सरहुल पूजा में मौसम की भविष्‍यवाणी होती है?

सरहुल पर्व के दिन सृष्टि के दो महान स्वरूप शक्तिमान सूर्य एवं कन्या रूपी धरती का विवाह होता है। उरांव संस्कृति में सरहुल पूजा के पहले तक धरती कुंवारी कन्या की भांति देखी जाती है। इससे पहले धरती से उत्पन्न नए फल-फूलों का सेवन बिलकुल वर्जित होता है, इस नियम को कठोरता से पालन किया जाता है। इसी दिन सरना स्थल में पूजा करने वाले पाहान के द्वारा घड़े का पानी देखकर बारिश की भविष्यवाणी करते हैं, जो बिलकुल सच साबित होता है।

सरहुल का संदेश :- परबों का सिरोमणि – सरहुल, हम सबके लिए नवजीवन, आशा, खुशी, सम्पन्नता, पवित्रता और एकता का त्यौहार बनकर आता है। सरहुल का पर्व हमें पर्यावरण को बचाने का संदेश देता है। आदिवासियों के पर्यावरण संरक्षण संबंधित पर्व – त्योहार से पूरी दुनिया को सीख लेने की जरूरत है।

निष्कर्ष:-

आज के इस Article में हमने जाना कि – सरहुल पर्व कब मनाया जाता है?, सरहुल पर्व कैसे और क्यों मनाया जाता है?, मुंडारी समाज के लोग बहा पोरोब में क्या करते हैं? आदि बहुत सारी जानकारियां आपके साथ साझा किए जो आपको जानने लायक हो।

आपको ये जानकारी कैसी लगी हमें Comment करके ज़रूर बताएं तथा अगर कोई सुझाव देना चाहते हैं तो वो भी Comment में लिख कर बताएं ताकि हम उसे सुधार कर इससे और भी बेहतर कर सकें।

FAQs:-

सरहुल पर्व (Sarhul Parv) कब मनाया जाता है?

सरहुल पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के तृतीया दिन से मनाया जाता है।

Sarhul Parv पर मछली और केकड़ा का क्या महत्व है?

यह मान्यता है कि जिस तरह केकड़े और मछली के असंख्य बच्चे होते हैं ठीक उसी तरह धान की बालियां भी असंख्य होंगी। पौराणिक कथाओं के अनुसार मछली और केकड़ा पृथ्वी के पूर्वज है। समुन्द्र के मिट्टी को ऊपर लाकर ही हमारी पृथ्वी बनी है, जिसका प्रयास मछली और केकड़ा ने भी किया था। इसीलिए सरहुल का पहला दिन उनके सम्मान के लिए समर्पित होता है।

सरहुल में पूजा कौन करता है?

गांव के मुख्य पाहान के द्वारा सरहुल पूजा किया जाता है। सभी धार्मिक अनुष्ठान पहान के द्वारा संचालित किया जाता है।

सरहुल कौन समुदाय के लोग मानते हैं?

सरहुल पूजा खास कर आदिवासियों का सबसे बड़ा त्यौहार है। लेकिन इस पर्व को आदिवासी समुदाय के लोगों के आलावा झारखण्ड सभी मूलवासी लोग भी बड़ी धूम – धाम से मानते हैं।

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