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Jagannath Mandir Ranchi | जगन्नाथ मंदिर रांची

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Jagannath Mandir Ranchi:- रथ यात्रा भारत का एक बहुत बड़ा पर्व है, इसमें भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को रथ में बैठाकर एक विशाल शोभा यात्रा निकाला जाता है। उड़ीसा राज्य के पुरी में विश्व के सबसे बड़ा रथ यात्रा निकाला जाता है, कहा जाता है कि सबसे पहले पुरी की रथ यात्रा शुरू होती है, उस रथ का चलने के बाद ही पूरे विश्व में जितने जगह रथ यात्रा होती हैं।

उड़ीसा के पुरी की तरह ही झारखंड के रांची जिला के बड़कागढ़ (जगरनाथपुर), धुर्वा में भी दूसरा सबसे बड़ा रथ यात्रा निकाला जाता है। पुरी में भगवान जगन्नाथ मंदिर/Jagannath Mandir Ranchi से तीनों भाई-बहनों के लिए अलग-अलग रथ रहता है लेकिन रांची में एक ही रथ में बैठाकर नगर भ्रमण करवा कर मौसी घर ले जाया जाता है।

आज के इस Article में जानेंगे कि:-

  • जगरनाथपुर (बड़कागढ़) का नाम कैसे पड़ा?
  • जगरनाथपुर (बड़कागढ़) कहां स्थित है?
  • जगन्नाथ मंदिर/Jagannath Mandir Ranchi का निर्माण कब और किसने करवाया था?
  • जगरनाथपुर (बड़कागढ़) कैसे पहुंचे?
  • जगरनाथपुर (बड़कागढ़) की इतिहास क्या है?

Table of Contents

जगन्नाथ मंदिर रांची/Jagannath Mandir Ranchi

Temple NameJagannath Mandir Ranchi
GodLord Jagannath
Place TypesLandmark & Historical Place
AddressJagannath Mandir Marg, Jagannathpur Chowk Khataal, Sector 1, Dhurwa, Ranchi, Jharkhand, India, 834004
Locality/City/VillageJagannathpur, Badkagarh, Dhurwa 
DistRanchi
StateJharkhand
CountryIndia
Official Websitehttps://ranchi.nic.in/
Coordinate23.3170241066, 85.2818425984
Phone+91 1124626966
Temple Timings5:00 AM to 12:10 PM & 3:00 PM to 7:30 PM

जगरनाथपुर (बड़कागढ़) का नाम कैसे पड़ा?

जगरनाथपुर का ही पुरना नाम है बड़कागढ़ जो राँची के धुर्वा थाना क्षेत्र में स्थित है। पहले इस क्षेत्र के राजा नागवंशी राजा रामशाह के चौथे पुत्र ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव हुआ करते थे। जिनको 97 गांव (गढ़) मिले थे जो एक काफी बड़ा क्षेत्र होता है। इसी कारण से इस क्षेत्र को बड़कागढ़ कहा जाता है और जब से यहां पर जगन्नाथ मन्दिर बना तब से इस क्षेत्र को जगरनाथपुर कहा जाने लगा।

जगरनाथपुर (बड़कागढ़) कहां स्थित है?

झारखण्ड के रांची से करीब 10 किलोमीटर दूर दक्षिण-पश्चिम दिशा धुर्वा थाना में स्थित जगरनाथपुर (बड़कागढ़) है और यहीं पर भगवान जगन्नाथ मंदिर स्थित है यहीं पर रथ यात्रा का आयोजन होता है।

Jagannath Mandir Ranchi | जगन्नाथ मंदिर रांची
Jagannath Mandir Ranchi | जगन्नाथ मंदिर रांची

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जगन्नाथ मंदिर (Jagannath Mandir Ranchi) का निर्माण कब और किसने करवाया था?

रांची के बड़कागढ़ में स्थित भगवान जगन्नाथ का विशाल मंदिर आस्था और विश्वास का केंद्र ही नहीं बल्कि आदिवासी और सदान के सम्मिलित विश्वास का भी प्रतीक है। इस आस्था की चौखट पर न धर्म-संप्रदाय का कोई महत्व है और ना ही किसी जातियों का यह हमेशा सब के लिए हमेशा खुला हुआ है। आदिवासी भी उतने ही भक्ति के साथ भगवान जगन्नाथ के दर्शन करते हैं जितना सदान या अन्य धर्मावलंबी के लोग करते हैं।  

जगन्नाथ मंदिर का इतिहास (History of Jagannath Temple) क्या है?

जगन्नाथ मंदिर का नींव किसने और कब रखा?

जगन्नाथ मंदिर की नींव वैष्णववाद एवं इसके संस्थापक चैतन्य महाप्रभु ने रखी थी। कहा जाता है कि जब 16वीं शताब्दी के आस पास बहुत सारे लोगों ने हिंदू धर्म को छोड़कर अन्य धर्म में धर्मांतरण कर रहे थे। तब हिंदू धर्म के धर्म गुरुओं ने हिंदू धर्म की रक्षा और पहचान को बचाए रखने के लिए भगवान जगन्नाथ मंदिर जैसे कई अन्य प्राचीन मंदिरों का निर्माण शुरू कर दिया था। 

जगन्नाथ मंदिर का निर्माण कब और किसने किया?

राँची के बड़कागढ़ स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर निर्माण 25 दिसंबर 1691 ईस्वी में किया गया था। इस मंदिर का निर्माण बड़कागढ़ के महाराजा रामशाह के चौथे पुत्र ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव के द्वारा किया था। जगन्नाथ मंदिर और गर्भगृह का सम्पूर्ण निर्माण संगमरमर के पत्थरों से किया गया है, जिसमें मंदिर के संस्थापक और स्थापना वर्ष के बारे में बताया गया है। 

जगन्नाथ मंदिर/Jagannath Mandir Ranchi का निर्माण बड़कागढ़ के एक छोटी पहाड़ी (टुंगरी) पर किया गया है, जिसकी ऊँचाई लगभग 85-90 मीटर है। मंदिर परिसर में कई तरह के पेड़-पौधे लगाए गए हैं, जो इसके वातावरण को सुंदर और भी शुद्ध बनाते हैं। मंदिर निर्माण काल से लेकर आज तक मंदिर की संरचना तथा मंदिर परिसर में कई तरह के बदलाव किए गए हैं। वर्त्तमान समय में यहां अपनी वाहन लेकर सीधे मंदिर के मुख्य द्वार तक पहुंच सकते हैं।

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जगन्नाथ मंदिर किसके तर्ज पर बनाया गया है?

रांची के जगन्नाथ मंदिर को पुरी के जगन्नाथ मंदिर के स्थापत्य कला की तर्ज पर बनाया गया है। इस मंदिर में भोग गृह के पहले गरुड़ मंदिर स्थिर है, जहां बीच में गरुड़ जी महाराज विराजमान हैं। गरुड़ मंदिर के आगे चौकीदार मंदिरस्थित है इन सभी मन्दिरों का निमार्ण एक साथ ही हुआ है। इन मंदिरों के आगे जगन्नाथ मंदिर न्यास समिति की देख-रेख में 1987 में एक विशाल छज्जे का निर्माण किया गया। अब इस जगह एक विशाल भवन बनाया गया है।

जगन्नाथ मंदिर/Jagannath Mandir Ranchi की विधि-व्यवस्था क्या है?

ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव ने जगन्नाथ मंदिर की विधि – व्यवस्था के लिए अपने 194 मौजों में से जगन्नाथपुर,आनि एवं भुसुर नामक तीन गांव मंदिर के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति घोषित कर अपनी उदारता का परिचय दिया था । इन तीनों मौजों के लगान एवं उपज से मंदिर का सारा खर्च चलता था लेकिन अभी के समय में तो यहां पर बहुत सारे पर्यटक तथा श्रद्धालु आते हैं और अच्छा-खासा दान-दक्षिण देकर चले जाते हैं। यही सारे पैसों से मंदिर का सारा खर्च चलता है।

Jagannath Mandir Ranchi | जगन्नाथ मंदिर रांची
Jagannath Mandir Ranchi | जगन्नाथ मंदिर रांची

पहले तीनों मौजों से जो सारा सामान आता था उसका हिसाब-किताब तथा मंदिर की देख-रेख में वे लोग किसी तरह से हस्तक्षेप नहीं करते थे। अंग्रेजों के शासन काल में मंदिर की विकट स्थिति हुई। मंदिर का काम तथा पूजा-पाठ सुचारू रूप से चले इसीलिए अंग्रेजी सरकार ने अपने ही पुलिस बल के जवान पंडित गंगाराम तिवारी को जगन्नाथ मंदिर का मुख्य पुजारी नियुक्त किया। 

एक समय गंगाराम तिवारी का भेंट मध्य प्रदेश से आए एक पंडित लेदूराम तिवारी से हुआ। उनलोगों में अच्छी दोस्ती हो गई तब गंगाराम तिवारी ने अपने दोस्त लेदूराम को भी अपने साथ देने को कहा यानि साथ में पूजा करने को क्योंकि उनका काम ज्यादा हो रहा था। बाद में गंगाराम तिवारी अपने बेटी की शादी के लिए अपने गांव पियरी चले गए और कभी वापस नहीं आए, तब से जगन्नाथ मंदिर के मुख्य पुजारी लेदूराम तिवारी हो गए।

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जगन्नाथ मंदिर न्यास समिति का गठन कैसे हुआ था?

1857 क्रान्ति में (जिसे आजादी की पहली लड़ाई भी कहते हैं) बड़कागढ़ के ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव ने छोटानागपुर में अपनी नेतृत्व किया था। आख़िर 16 अप्रैल 1858 को उन्हें पकड़कर फांसी दे दी गई। साथ में मुख्य पुजारी लेदूराम तिवारी को भी गिरफ्तार किया और राजा के सभी 97 गांव को भी सरकार ने जब्त कर लिया फिर बड़कागढ़ का नाम बदलकर “खास महल” कर दिया गया। बाद में अपील करने के बाद सरकार ने जगन्नाथ मंदिर/Jagannath Mandir Ranchi के मुख्य पुरोहित को वापस कर दिया। 

जगन्नाथ मंदिर हमेशा से पारिवारिक तथा वंशानुवाद के कारण विवादों में घिरा हुआ है और यह विवाद आज भी थमा नहीं, लेकिन फिलहाल सरकार ने इसे कानूनी रूप से सार्वजनिक संपत्ति घोषित कर दी है। 1964 में धार्मिक न्यास परिषद की ओर से जगन्नाथ मंदिर को सार्वजनिक संपत्ति घोषित कर दी गई। उसके बाद पटना उच्च न्यायालय ने भी इस फैसले पर अपनी मुहर भी लगा दी और आखिर 1977 में जगन्नाथपुर न्यास समिति का गठन किया गया।

पहली गठित जगन्नाथपुर न्यास समिति के पदाधिकारी का नाम :-

मंदिर का नाम जगन्नाथ मंदिर रांची, Jagannath Mandir Ranchi
अध्यक्षरामरतन राम
पदेन सचिवडीसी रांची
कोषाध्यक्षराधेश्याम नाथ शाहदेव
पदेन सचिवएच. ई. सी. , सी. एम. डी.
सदस्यबी. राम सम्पर्क पदाधिकारी, चीफ़ ऑफ पुलिस, जगदीश शुक्ला, अधिवक्ता बलराम ठाकुर, गोपी कृष्ण महेश्वरी, सरस्वती कच्छप, एवं बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद पटना पदेन सदस्य।

    जगन्नाथपुर न्यास समिति के गठित हो जाने के बाद मंदिर अब सुचारू रूप से चल रहा है तथा उसके साथ उसका निर्माण कार्य भी हो रहा है। मंदिर समिति मंदिर की जमीन को पाने का प्रयास कर रही है। जो उस समय एच.ई.सी के लिए बिहार सरकार ने देवोत्तर भूमि (मंदिर का जमीन) का भी अधिग्रहण किया था। 

    जगन्नाथ मंदिर/Jagannath Mandir Ranchi का स्थापना दिवस कब मनाया जाता है?

    हर साल जगन्नाथपुर में 25 दिसंबर को मंदिर प्रांगण में जगन्नाथ मंदिर स्थापना दिवस मनाया जाता है। इस दिन मंदिर में 1 लाख विष्णु लाक्षार्चना का विशेष पाठ होता है, जिसमें सैकड़ों – हज़ारों श्रद्धालु भाग लेते हैं। इस विशेष पाठ में पुरुष धोती तथा महिलाएं साड़ी पहनकर पूजा-अर्चना करतीं हैं। इस दिन सुबह 6 से लेकर दिन 12 बजे तक यह अनुष्ठान होता है फिर उसके बाद भंडारे का आयोजन होता है। यहां आए हुए सभी लोग भंडारे में बना हुआ भोग का खाते हैं।

    जगन्नाथ मंदिर से जुड़े लोककथा एवं किंवदंतीयां क्या-क्या हैं?

    भगवान जगन्नाथ मंदिर के निर्माण की लोककथा/किंवदंती सैकड़ों सालों से सुनते आ रहे हैं ये कथाएं काफ़ी प्रचलित तथा बेहद ही रोचक है, जिसे हमें अवश्य जानना चाहिए। बहुत समय पहले की बात है रांची के बड़कागढ़ क्षेत्र पर नागवंशी राजा ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव का शासन हुआ करता था। ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव जब अपने बुढ़ापे में पहुंच गए तो उनकी संसार की मोह माया खत्म हो गई थी। अब बस उन्हें भक्ति में लीन रहने तथा चारों धाम की यात्रा करने का मन करने लगा।

    Jagannath Mandir Ranchi | जगन्नाथ मंदिर रांची
    Jagannath Mandir Ranchi | जगन्नाथ मंदिर रांची

    एक दिन नागवंशी राजा ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव ने उड़ीसा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर की दर्शन करने का मन बनाया और अपने साथी, नेता – मंत्री, नौकर – चाकर, सैनिक तथा खाने – पीने का सामान को लेकर पुरी यात्रा के लिए निकल पड़े। उस समय की यात्रा आज की तरह सुगम नहीं था, उन्हें रास्ता में जल – जंगल, पहाड़ – पर्वत, नदी – नाला को पार करना पड़ा और वे लोग आखिर पुरी जगन्नाथ मंदिर पहुंच गए।

    वहां पहुंचकर उन्होंने अपना टेंट ⛺ लगाया और समुन्द्र में नहा धोकर स्वामी जगन्नाथ का दर्शन तथा पूजा – अर्चना करने के लिए मंदिर गए। मंदिर में पूजा करने के बाद सभी अपने टेंट पर आ गए कोई लोग तो मंदिर प्रांगण में ही विश्राम करने लगे। राजा का मन अब यहां से जाने का नहीं होने लगा, इसीलिए वह पूजा – पाठ में समय व्यतीत करने लगा। सोते-जागते उसकी जुबान पर बस महाप्रभु जगन्नाथ स्वामी का ही नाम सुनाई देने लगा। आस्था और भक्ति की गंगा में वह इस तरह से डूब गया कि जिसका व्याख्या करना मुश्किल है। उसे लगने लगा कि भगवान जगन्नाथ स्वामी से उसका सीधा मिलन हो गया। 

    लेकिन उनके साथ गए हुए उरांव सेवक/नौकर का दिक्कत होने लगा कारण वो मंदिर में बना हुआ भोग भात खाने से मना कर दिया था। राजा ने उसे कहा कि यहां बिना भेदभाव किए भगवान जगन्नाथ स्वामी का प्रसाद सभी कोई ग्रहण कर रहा है इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं हो रहा है फिर तुम्हें क्यों हो रहा है। ये सब बातें सुनकर भी उरांव सेवक वहां खाना खाने के लिए मना कर दिया और वो उपवास/भूखा ही रहने लगा।

     वो लगातार एक सप्ताह तक तो ठीक तरह से खाली पेट रहा लेकिन सातवीं रात में वो भूख से खलबलाने लगा और बोलने लगा कि अगर वास्तव में भगवान जगन्नाथ स्वामी यहां पर हैं तो मेरे उदर (पेट) की भूख को क्यों नहीं मिटा रहें हैं। तभी थोड़ी देर बाद में वो देखा कि उसके सामने से एक बूढ़ा ब्राह्मण एक सोने का थाली में कुछ लेकर आ रहा है। वो सोने की थाली में भात – सब्जी लेकर आया था, वो सामने आकर बोला कि तुम बहुत भूखे हो लो थोड़ा खाना खा लो और सो जाओ। इतना कहकर वो बूढ़ा आदमी वहां से चला गया।

    खाना खाकर उसका मन तृप्त हो गया तथा उसे अपार संतुष्टि मिली। आखिर उसे सात दिनों की भूख शांत हुई। खाना खाकर जब वो सो गया तब उसे सपने में भगवान श्री कृष्ण अपने बारे बताया बोला की वो बूढ़ा ब्राह्मण व्यक्ति मैं ही था। तुम बहुत बड़ा सौभाग्य वाले हो जो मुझे साक्षात दर्शन किया। अगले दिन महाराजा ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव ने उरांव सेवक के पास सोने का थाली देखी तो उसके बारे उसे पूछताछ करने लगे। उरांव सेवक ने अपनी सारी बातें राजा साहब को बताया। 

    पूरी कहानी सुनने के बाद खुद राजा को अपमान सा लगने लगा। उनके मन में आया कि मैं इतने दिनों से रात – दिन भगवान जगन्नाथ स्वामी की भक्ति में लीन होने पर भी मुझे ऐसा सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ लेकिन इस साधारण सा सेवक को आसानी से भगवान जगन्नाथ का दर्शन हो गया। ठीक उसी रात महाराजा ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव को स्वप्न आया कि जिसमें भगवान कृष्ण ने उसे कहा कि तुम अब वापस अपना घर, अपना राज्य चले जाओ वहीं पर भगवान जगन्नाथ स्वामी यानी मेरा एक मंदिर का स्थापना करना। वहीं पर मैं तुम्हें साक्षात दर्शन दूंगा। इसे राजा ने भगवान का आदेश मानकर वे अपने सारे साथी, नेता – मंत्री, नौकर – चाकर, सैनिक के साथ वापस अपनी राजधानी सतरंजी लौट आए।

    नागवंशी राजा ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव अपनी राजधानी लौटने के बाद सुबह – शाम मंदिर निर्माण की ही बात सोचते थे। आखिर उन्होंने अपने पूरे परिवार, शुभचिंतकों, सरदारों, गुरुओं आदि से विचार – विमर्श किया और मंदिर निर्माण करने का सही स्थान का चयन किया। उन्होंने आदेश दिया कि पुरी की तरह ही भगवान जगन्नाथ स्वामी का भव्य मंदिर बनवाया जाए। इसके बाद मराठी राजगुरु हरिनाथ चारी के तत्वाधान में 1691 में जगन्नाथ मंदिर बनकर तैयार हो गया। तब बड़कागढ़ का इलाका जंगलों से घिरा हुआ था।

    जगन्नाथ मंदिर/Jagannath Mandir Ranchi में हर जाति के लोगों के लिए काम तय है।

    कहा जाता है कि उसी समय नागवंशी राजा ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव ने यह भी तय कर दिया कि भगवान जगन्नाथ स्वामी की सेवा सभी जाति के लोग कर सकते हैं। इस मंदिर में घंटी बजाने और तेल-भोग चढ़ाने की जिम्मेदारी आदिवासी उरांव परिवार की होगी। वहीं, आदिवासी मुंडा परिवार के लोग यहां झंडा फहराएंगे तथा पगड़ी देंगे। साथ ही मुंडा परिवार के लोग ही वार्षिक पूजा भी करेंगे। 

    Jagannath Mandir Ranchi | जगन्नाथ मंदिर रांची
    Jagannath Mandir Ranchi | जगन्नाथ मंदिर रांची

    जबकि, रजवार और यादव(अहीर) जाति के लोग भगवान जगन्नाथ स्वामी को मुख्य मंदिर से गर्भगृह तक ले जाएंगे। फिर, बढ़ई परिवार के लोग मंदिर आदि का रंग-रोगन तथा लकड़ी का सारा काम करेंगे। वहीं, लोहरा समुदाय के लोग भगवान जगन्नाथ स्वामी के रथ की मम्मत करेंगे। इसी तरह, कुम्हार समुदाय के लोग मिट्टी का बर्तन, दीया आदि बनाकर उपलब्ध कराएंगे। आज भी इस परंपरा का यहां निर्वहन होता है।

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    एक छोटी-सी पहाड़ी (टुंगरी) पर भगवान जगन्नाथ स्वामी का मंदिर स्थित है।

    वर्ष 1691 में बना भगवान जगन्नाथ स्वामी का यह मंदिर रांची के बड़कागढ़ (जगन्नाथपुर), धुर्वा में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण एक छोटी-सी एक पहाड़ी (टुंगरी) पर किया गया है। यह मंदिर दिखने में बिल्कुल जगन्नाथ मंदिर पुरी की तरह ही प्रतीत होता है यहां पर हर साल विशाल रथ यात्रा का आयोजन होता है जो कि पुरी के रथ यात्रा जैसा ही होता है। 

    पहले बड़कागढ़ का इलाका एक रियासत का हिस्सा था। ये इलाका राजा के 97 गावों में से एक था जो कि काफी खास था। जगन्नाथ मंदिर के आस – पास काफ़ी घना जंगल था तथा इसके चारों ओर हरियाली ही हरियाली था, जो किसी को भी अपने ओर आकर्षित करती थी। इस टुंगरी की ऊंचाई लगभग 85-90 मीटर है। दर्शक या श्रद्धालु को इस मंदिर में चढ़ने के लिए कोई दिक्कत न हो इसीलिए मंदिर में सीढ़ी का निर्माण किया गया।

    भगवान जगन्नाथ स्वामी की नेत्र दान की पूजा होती है।

    रांची के ऐतिहासिक जगन्नाथपुर मंदिर के तत्कालीन मुख्य पुजारी रामेश्वर पाढ़ही के अनुसार नेत्रदान की पूजा का मतलब भगवान जगन्नाथ स्वामी के नेत्र के श्रृंगार से जुड़ा हुआ है। उनके अनुसार भगवान का अज्ञातवास ज्येष्ठ पूर्णमासी के दिन ही शुरू होता है। पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ को स्नान कराने के लिए विशेष जल से मिट्टी के घड़े एकत्रित किया जाता है। इस जल से भगवान को नहलाने के बाद भगवान का तबीयत खराब हो जाती है और जिसके बाद वो बीमार हो जाते हैं। बीमार होने के कारण भगवान अज्ञातवास में चले जाते हैं, यही कारण है कि उस समय वे किसी को दर्शन नहीं देते हैं।

    जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ स्वामी 16 दिनों तक गर्भ गृह में अज्ञातवास में रहते हैं। फिर वह 16 दिनों के बाद शाम में भगवान जगन्नाथ स्वामी को अज्ञातवास से बाहर निकालते हैं। बाहर निकालने के बाद नेत्रदान की पूजा की जाती है। उसके बाद भगवान जगन्नाथ को भोग लगाया जाता है। नेत्र दान के दिन से ही यहां पर श्रद्धालुओं का आने जाने का तांता लगा हुआ रहता है। 

    नेत्र दान की पूजा के बाद भगवान जगन्नाथ स्वामी की रथ यात्रा निकाली जाती है, जहां नवनिर्मित 36-40 फीट ऊंचे रथ पर भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और सुभद्रा के साथ विराजमान होते हैं। तीनों भाई – बहन रथ में बैठकर मुख्य मंदिर से मौसीबाड़ी तक जाते हैं।

    जगन्नाथ मंदिर/Jagannath Mandir Ranchi का धार्मिक महत्व क्या है?

    रांची के जगन्नाथपुर में स्थित जगन्नाथ मंदिर की पूजा अन्य हिंदू मंदिरों से काफी भिन्न होता है। यहां के पुजारियों को पांडा के नामों से जाना जाता है। भगवान जगन्नाथ के भक्त नदी, तालाब या घर से ही स्नान करके जाते हैं और उनका दर्शन तथा पूजा – पाठ करते हैं। पूजा की शुरुआत भगवान जगन्नाथ को फूल-फल और भोजन/भोग चढ़ाने से होती है। 

    देवताओं को सुबह, दोपहर तथा रात का भोजन भी दिया जाता है, जिसे भोग के नाम से जाना जाता है। जगन्नाथ मंदिर में तीन बार आरती होती है – सुबह, दोपहर और रात। पुरी के रथ यात्रा के समान ही इस मंदिर में भी आषाढ़ के महीने में एक वार्षिक मेले के साथ रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है। 

    ये मेला 10 दिनों तक लगता है, जिसमें न केवल रांची से बल्कि पूरे झारखंड तथा पड़ोसी गांवों और कस्बों से भी हजारों आदिवासी और गैर-आदिवासी श्रद्धालु यहां पर भगवान जगन्नाथ स्वामी का दर्शन करने आते हैं। यहां पर रथ यात्रा को बहुत ही धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

    जगन्नाथ मंदिर रांची/Jagannath Mandir Ranchi की भौगोलिक स्थिति क्या है?

    भगवान जगन्नाथ का मंदिर एक पहाड़ी/टुंगरी की चोटी पर स्थित है, जिसकी उंचाई करीब 85-90 मीटर है। मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालु/दर्शक सीढ़ियां से जा सकते हैं या तो जिसे सीढ़ी चढ़ने के लिए दिक्कत होती है वो सड़क मार्ग से घूमकर किसी भी वाहन या पैदल ऊपर तक जा सकते हैं। 

    मंदिर पहुँचने के लिए लगभग 100-200 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। अगर आप पैदल मंदिर तक जाते हैं तो बीच में रुक कर आराम भी कर सकते हैं। जैसे ही आप मंदिर तक पहुँच जाते हैं, जगन्नाथ मंदिर न्यास समिति की ओर से श्रद्धालुओं के लिए ताजे पानी की व्यवस्था किया गया है। उसमें आप अपना हाथ – पैर धो सकते हैं, पानी पी सकते हैं तथा जल चढ़ाने के लिए भी ले जा सकते हैं। मंदिर के चारों ओर पेड़ – पौधों से भरा हुआ जिसके ठंडी छाया में बैठकर अपनी थकान दूर कर सकते हैं। 

    मंदिर तक चढ़ने के बाद आप चारों ओर का नज़ारा देख सकते हैं, जो देखने में काफी सुन्दर और मनमोहक होता है। यहां से आप पहाड़ी मंदिर, विधानसभा भवन, धुर्वा डैम, JSCA स्टेडियम आदि का नज़ारा देख सकते हैं। यहां से काफ़ी सुंदर दृश्य आने के कारण लोग यहां पर फ़ोटोशूट, वीडियो शूट, वैडिंग फ़ोटोशूट, वीडियो शूट, नागपुरी तथा अन्य क्षेत्रीय भाषा वाला वीडियो शूटिंग करते हैं।

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    जगन्नाथ मंदिर रांची/Jagannath Mandir Ranchi की वास्तुकला कैसी है?

    रांची के ऐतिहासिक जगन्नाथपुर, बड़कागढ़ में स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर का निर्माण उड़िसा/उत्कल के कलिंग शैली की वास्तुकला के अनुसार किया गया है। मंदिर की बनावट उड़ीसा के पुरी में स्थित प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर जैसा ही है। हालांकि, इस मंदिर का आकार में पुरी के जगन्नाथ मंदिर की तुलना से छोटा है। मंदिर में भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की पूजा की जाती है। 

    सभी देवताओं को नीम की लकड़ी से उकेरा/बनाया गया है। जगन्नाथ मंदिर को जटिल नक्काशी के साथ बड़े ही सुन्दर तरीके बनाया गया है। इस मंदिर को रंगों के अनूठे मिश्रण के साथ सजाया गया है, जिससे मंदिर देखने में और भी आकर्षक लगता है। मंदिर के अंदरूनी हिस्से को एक किले के रूप में बनाया गया है, जिसके चलते श्रद्धालुओं को पूजा करने में कोई दिक्कत नहीं होती है। मंदिर के भीतर एक लंबा गर्भगृह है, भगवान अपने अज्ञातवास में यहीं पर रहते हैं। 

    जगन्नाथ मंदिर परिसर में जगमोहन मंदिर,नट मंदिर, विष्णु मंदिर, शिव मंदिर, काली मंदिर और हनुमान जी का मंदिर भी स्थित है। जबकि मंदिर के बाहर प्रांगण में गरुड़ की मूर्ति विराजमान हैं। जगन्नाथ मंदिर, वैष्णव पंथ से संबंधित भक्तों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। 

    जगन्नाथ मंदिर रांची/Jagannath Mandir Ranchi के खुलने का समय क्या है?

    भगवान जगन्नाथ स्वामी जी के मंदिर सुबह 5:00 बजे तक खुल जाता है फिर प्रातः आरती 6:00 बजे किया जाता है। अन्न भोग का समय दोपहर 12:00 बजे है, जिसमें भगवान को हर दिन दोपहर का भोजन दिया जाता है। भगवान जगन्नाथ स्वामी जी भोजन करने के बाद दोपहर 12:10 बजे से 3:00 बजे तक अपने शयनकछ में सोने के लिए चले जाते हैं, इसका मतलब इस समय आप भगवान का दर्शन नहीं कर सकते हैं। 

    पुनः मंदिर का मुख्य दरवाजा शाम के 3:00 बजे खुलता है। मंदिर का पट खुलने के बाद संध्या कालीन मंगल आरती 3:00 बजे की जाती है। शरद कालीन के समय शाम के 5:30 से 6:30 बजे माइक के द्वारा भजन गाया जाता है, वहीं ग्रीष्म कालीन का समय शाम के 6:00 से 7:00 बजे तक है। शरद कालीन के समय शयन आरती शाम के 7:00 बजे होता है उसके बाद भगवान का पट 7:30 बजे तक बंद कर दिया जाता है यानि भगवान अब सोने चले जाते हैं। वहीं ग्रीष्म कालीन का समय शयन आरती शाम के 7:30 बजे होता है फिर भगवान 8 बजे तक सोने के लिए चले जाते हैं यानी मंदिर का पट बंद हो जाता है।

    नोट :- हर दिन भगवान जगन्नाथ स्वामी जी का दर्शन प्रातः 5:00 बजे से दोपहर के 12:10 तक होता रहेगा। फिर 3:00 बजे अपराह्न से लेकर रात्रि 7:30 बजे प्रभु श्री जगन्नाथ स्वामी जी का दर्शन होगा।

    जगन्नाथ मंदिर रांची में कैसे पहुंचे? (How to reach Jagannath Temple Ranchi?)

    रांची के जगन्नाथ मंदिर का शानदार सौंदर्य और दृश्य सभी प्रकार के श्रद्धालुओं/आगंतुकों/पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है। यहां पर लोग रिक्शा, ई – रिक्शा, साइकिल, मोटरसाइकिल, कार, बस, ऑटो रिक्शा, टैक्सी, Ola, Uber, Rapido आदि के माध्यम से आसानी से आ सकते हैं।

    देश के अन्य हिस्सों के साथ-साथ विदेशों से भी आने वाले श्रद्धालुओं/आगंतुकों/पर्यटकों रांची शहर में स्थित बिरसा मुंडा हवाई अड्डा/रांची हवाई अड्डे तथा रांची रेलवे स्टेशन या हटिया रेलवे स्टेशन या फिर खादगाढ़ा बस स्टैंड में उतर कर आसानी से मन्दिर तक पहुंच सकते हैं।

    साधन नजदीक स्थानदुरी/समय
    By AirBirsa Munda International Airport, Ranchi07 Km/(15 min)
    By Train Ranchi Railway Station
    Hatia Railway Station
    8.7 Km/(20 min)
    5.7 Km/(13 min)
    By BusBirsa Munda Bus Terminal, Khadgarha, Ranchi 11 Km/(30 min)
    By BusGovt Bus Stand, Ranchi08 Km/(20 min)

    Local Transport :- Jagannath Mandir Ranchi जाने के लिए आप अपने निजी वाहन, Ola, Uber, ऑटो रिक्शा, ई रिक्शा, साइकिल, पैदल से बिलकुल आसानी से पहुंच सकते हैं।

    जगन्नाथ मंदिर/Jagannath Mandir Ranchi का पुरा पता क्या है?

    GodLord Jagannath
    Temple NameJagannath Mandir Ranchi
    Place TypesLandmark & Historical Place
    AddressJagannath Mandir Marg, Jagannathpur Chowk Khataal, Sector 1, Dhurwa, Ranchi, Jharkhand, India, 834004
    Locality/City/VillageJagannathpur, Badkagarh, Dhurwa 
    DistRanchi
    StateJharkhand
    CountryIndia
    Coordinate23.3170241066, 85.2818425984
    Phone+91 1124626966
    Temple Timings5:00 AM to 12:10 PM & 3:00 PM to 7:30 PM

    जगन्नाथ मंदिर रांची/Jagannath Mandir Ranchi की किन-किन नामों से जाना जाता है?

    Jagannath Mandir को जगन्नाथ मंदिर पहाड़ी, बड़कागढ़ पहाड़ी, जगन्नाथपुर पहाड़ी, रथ मेला, रथ टुंगरी, जगन्नाथ टुंगरी, रथ यात्रा मेला के नामों से जाना जाता है।

    Conclusion:-

    आज के इस आर्टिकल में हमने आपको बताया कि – Jagannath Mandir Ranchi क्या है?, jagannath Mandir कहां स्थित है? तथा jagannath Temple /Jagannath Mandir Ranchi का इतिहास क्या है? आदि जैसे और भी बहुत कुछ जो आपको जानने लायक हो।

    आपको ये जानकारी कैसी लगी हमें Comment करके ज़रूर बताएं तथा अगर कोई सुझाव देना चाहते हैं तो वो भी Comment में लिख कर बताएं ताकि हम उसे सुधार कर इससे और भी बेहतर कर सकें।

    FAQs

    जगरनाथपुर (बड़कागढ़) का नाम कैसे पड़ा?

    जगरनाथपुर (बड़कागढ़) के कारण।

    जगरनाथपुर (बड़कागढ़) कहां पर स्थित है?

    जगरनाथपुर,बड़कागढ़, धुर्वा, रांची

    क्या Jagannath Mandir Ranchi में Entry Fee’s लगता है?

    Fully Free लेकिन आप मंदिर में इच्छा पूर्ण दान कर सकते हैं।

    क्या Jagannath Mandir से पूरी रांची देखा जा सकता है?

    नहीं, लेकिन यहां से आस – पास के इलाका जैसे धुर्वा डैम, विधानसभा भवन, धुर्वा, हटिया स्टेशन, रांची हवाई अड्डा आदि देख सकते हैं।

    Jagannath Mandir Ranchi जाने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?

    वैसे तो आप दिन के समय मंदिर में कभी भी पूजा के लिए आ सकते हैं लेकिन Morning 5-6 AM or Evening 5-6 PM यानि इस समय यहां पर प्रातः कालीन आरती तथा संध्या कालीन आरती होती है। अगर आप इस समय आते हैं तो आराम से पूजा के साथ आरती भी कर सकते हैं।

    Jagannath Mandir Ranchi को किस नाम से जाना जाता है?

    रथ मेला, बड़ाकगढ़ मेला, जगन्नाथ मेला, रांची रथ यात्रा मेला, बड़ाकगढ़ रथ यात्रा मेला आदि।

    Jagannath Mandir को किसने बनवाया था?

    बड़कागढ़ के नागवंशी राजा रामशाह के चौथे पुत्र ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव ने 25 दिसम्बर 1691 में जगन्नाथ मंदिर/Jagannath Mandir Ranchi का निर्माण करवाया।

    अभिलिप्सा पांडा का जीवन परिचय | Abhilipsa Panda Biography in Hindi

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    Abhilipsa Panda Biography in Hindi:- हर हर शंभू शिव महादेवा/Har Har Shambhu Shiva Mahadeva अभी के समय में भारत में एक बहुत ही Famous Trending Song है जो सोशल मीडिया में वायरल हो गया है। ये गाना हर किसी के होंठों पर छाया हुवा है। इस गाने को अपने सुमधुर आवाज से सजायी है उभरती हुई नई गायिका/गायक अभिलिप्सा पांडा/Abhilipsa Panda और Jitu Sharma/जितु शर्मा ने।

    इस गाने को अभी लोग काफ़ी पसंद कर रहे हैं इसी के चलते अभी जारों से इन्टरनेट में Search किया जा रहा है आख़िर कौन है अभिलिप्सा पांडा, Abhilipsa Panda Biography in Hindi/अभिलिप्सा पांडा का जीवन परिचय आदि।

    आज के Article में जानेंगे:-

    • अभिलिप्सा पांडा कौन हैं ?
    • अभिलिप्सा पांडा का प्रारंभिक जीवन कहां से शुरू हुई?
    • अभिलिप्सा पांडा का शैक्षणिक जीवन कहां से शुरू हुई?
    • अभिलिप्सा पांडा से जुड़े रोचक जानकारियाँ।
    • अभिलिप्सा पांडा का वायरल गीत से जुड़े रोचक जानकारियाँ। 

    Table of Contents

    अभिलिप्सा पांडा कौन हैं? | Who is Abhlipsa Panda?

    Abhilipsa Panda
    नाम अभिलिप्सा पांडा
    पेशा गायिका
    पिता का नाम अशोक पांडा
    माता का नामपुष्पाश्री पांडा
    दादा का नाम रवि नारायण पांडा
    बहन का नाम आकांक्षा पांडा
    जन्म तिथि 30 नवंबर 2004
    जन्म स्थान तेंतालबहल,देवगढ़,उड़ीसा
    होम टाउन बड़बिल,क्योंझर,उड़ीसा
    धर्म हिन्दू
    जातिब्राह्मण
    शिक्षा 12 वीं पास
    ऊँचाई 5 फीट 3 इंच
    वैवाहिक स्थिति अविवाहित
    स्कूल का नाम केंद्रीय विद्यालय
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    YouTubeClick Here

    अभिलिप्सा पांडा भारत की बहुत ही Popular उभरती हुयी चर्चित नई गायिका हैं। अभी के समय में पूरे भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी हर हर शंभु गाना लोगों के काफ़ी पसंद किया जा रहा है। गाने के शुरुवाती बोल हैं – हर हर शंभू शिव महादेवा/ Har Har Shambhu Shiva Mahadeva इस गाने को Social Media में काफ़ी पसंद किया जा रहा है, YouTube में काफी समय Trending ने No.1 रही।

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    अभिलिप्सा पांडा एक Famous Singer के साथ – साथ बहुत अच्छी Dancer, Matial Arts Champian रही हैं। मार्शल आर्ट्स में अभिलिप्सा पांडा National Gold Medalist रह चुकी हैं।

    अभिलिप्सा पांडा का प्रारंभिक जीवन कहां से शुरू हुई?

    Abhilipsa Panda का जन्म 30 नवंबर 2004 में उड़ीसा के देवगढ़ जिला के तेंतालबहल गांव में एक ब्राह्मण पारिवार में हुआ। इसके पिता श्री अशोक पांडा, माता का नाम श्रीमती … देवी, बहन का नाम आकांक्षा पांडा तथा दादा जी का नाम रवि नारायण पांडा है। इनको गाने के शोक बचपन से ही है।

    Abhilipsa Panda

    अभिलिप्सा पांडा बचपन में अपने दादा के साथ गीत संगीत सीखा करती थी और अपनी नानी के साथ मंत्र जप करना सीखती थी। उनकी नानी के उसे मंत्र उच्चारण करना सिखाई जिसे धीरे – धीरे अभिलिप्सा ने मंत्रों को गाने के रूप में गाना शुरू किया जिसे उसके घर वाले लोग काफी पसंद करने लगे। अपने दादा के साथ वो शास्त्रीय संगीत और हरमोनियम बजाने सीखी तथा उनकी मां से क्लासिकल ओड़िसी डांस सीखी।

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    अभिलिप्सा पांडा की मां भी एक समय की ओड़िशी नृत्यिका रह चुकी हैं। इन्होंने अपनी मां के साथ ही डांस सीखी है। इसकी बहन आकांक्षा पांडा भी बहुत अच्छी सिंगर है। सावन महीने में इन दोनों बहनों का एक नया गीत ;- सावन आयो अपने ही YouTube Channe – Rockstar Abhilipsa Panda में आया।

    अभिलिप्सा पांडा का शैक्षणिक जीवन कहां से शुरू हुई?

    अभिलिप्सा पांडा को जब स्कूल में दाखिला करा दिया उसी समय उसे कराटे क्लास तथा डांस क्लास में भर्ती करा दिया गया था। वो बचपन से ही गाने, नाचने, पढ़ने, योगा और कराटे में काफ़ी ध्यान देती थी। जिसके चलते ये इन सभी कार्यों में सफलता हासिल की। 

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    Abhilipsa Panda शुरू से ही पढ़ने लिखने में बहुत ही अच्छी थी। उनके स्कूल में जो भी कार्यक्रम होते थे सभी में वो बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती थी। अभिलिप्सा पांडा 2022 में ही 12th की परीक्षा को अच्छे नंबरों से पास की है और अब आगे की पढ़ाई भी जारी है।

    अभिलिप्सा पांडा का वायरल वीडियो/गीत (Abhilipsa Panda Viral Video/Song):-

    Abhilipsa Panda अपने कैरियर की शुरूआत एक Music Album “मंजिल केदारनाथ/Manjil Kedarnath” से की थी। अभी 5 मई 2022 को एक गाना Har Har Shambhu Shiva Mahadeva/हर हर शंभू शिव महादेवा रिलीज हुआ जो अभी के समय में पुरे भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी काफ़ी प्रचलित गीत बन चुका है साथ ही साथ YouTube में Tranding में रहा है। 

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    हर हर शंभू शिव महादेवा वीडियो में Abhilipsa Panda (अभिलिप्सा पांडा) के साथ Jitu Sharma (जीतू शर्मा) नजर आते हैं और इस गाने को दोनों ने ही गाया है। जीतू शर्मा ने ही इस गाने के Lyrics को तैयार किया है और इस गाने को संगीत से सजाया है आकाश देव ने । इस गाने को AD Studio Jamshedpur (Akash Dew) में रिकॉर्डिंग किया गया तथा इसे Jitu Sharma नाम के YouTube Channel में 5 May 2022 को Upload किया गया है।

    Har Har Shambhu Shiva Mahadeva गाने को जीतू शर्मा ने दक्षिण अफ्रीका के महशुर भजन गायिका Achyut Gopi (अच्युत गोपी) के Bhaj Man Radhe Govinda के भारतीय Version के अनुसार बनाया है। परन्तु कुछ लोगों ने Fake Copyright देकर Video को Take Down करा दिया था उसके बाद Video को दोबारा YouTube में Publish कर दिया गया अब गाना YouTube पर Available है। इसके साथ ही फ़रमानी नाज़ से भी विवाद हो गया था परन्तु जीतू शर्मा और अभिलिप्सा पांडा का ही गाना Original है। 

    अभिलिप्सा पांडा के गाने की सूची ( Abhilipsa Panda Songs List):-

    क्रम संख्यागानों के नाम
    1Manjil Kedarnath/मंजिल केदारनाथ
    2Har Har Shambhu Shiva Mahadeva/हर हर शंभू शिव महादेवा 
    3Shiva Rudrakashtam/शिव रुद्राकष्टम 
    4Sawan Aayo/सावन आयो
    5Naam Tera Bhole/नाम तेरे भोले
    6Kalki Avatar/कल्कि अवतार
    7Har Har Shambhu Lofi Mix/हर हर शंभू लोफी मिक्स
    8Bholenath Ji Lofi/भोलेनाथ जी लाेफी
    9Nam Tera Bhole/नाम तेरा भोले
    10Mera Chhota Sa Sansar/मेरा छोटा सा संसार
    11Hey Bhole Bhaba/हे भोले बाबा
    12Bum Bholenath/बम भोलेनाथ 

    Conclusion:-

    आज के इस Article में हमने जाना कि – कौन है अभिलिप्सा पांडा?, अभिलिप्सा पांडा का प्रारंभिक जीवन कहां से शुरू हुई?, अभिलिप्सा पांडा का शैक्षणिक जीवन कहां से शुरू हुई?, अभिलिप्सा पांडा से जुड़े रोचक तथ्य, अभिलिप्सा पांडा का वायरल गीत आदि बहुत सारी जानकारियां आपके साथ साझा किए जो आपको जानने लायक हो।

    आपको ये जानकारी कैसी लगी हमें Comment करके ज़रूर बताएं तथा अगर कोई सुझाव देना चाहते हैं तो वो भी Comment में लिख कर बताएं ताकि हम उसे सुधार कर इससे और भी बेहतर कर सकें।

    FAQs:-

    अभिलिप्सा पांडा कौन हैं?

    भारत के उड़िसा राज्य के हैं Famous Singer Abhilipsa Panda जिन्होंने Trending Song Har Har Shambhu Shiva Mahadeva गाने में अपनी सुरीली आवाज दी हैं। यही गाने से उसे काफ़ी पसंद किया जा रहा है।

    हर हर शंभू शिव महादेवा गाने की रिकॉर्डिंग कहां हुआ है?

    इस गाने की रिकार्डिंग AD Studio Jamshedpur (Akash Dew), Jharkhand में हुआ है। 

    अभिलिप्सा पांडा को क्या – क्या पुरस्कार मिला है?

    Martial Arts में अभिलिप्सा पांडा National Gold Medal 🏅 तथा Odisha Super Singer Contestent में Governer Trophy 🏆 भी प्राप्त हुआ है।

    अभिलिप्सा पांडा कौन से धर्म से है?

    अभिलिप्सा पांडा हिंदू सनातन धर्म के ब्राह्मण जाति से हैं। वो हिंदू धर्म में बहुत विश्वास रखती हैं।

    अभिलिप्सा पांडा के पिता का नाम क्या है?

    अशोक पांडा

    अभिलिप्सा पांडा के माता का नाम क्या है?

    पुष्पाश्री पांडा

    अभिलिप्सा पांडा के दादा का नाम क्या है?

    रवि नारायण पांडा

    अभिलिप्सा पांडा के बहन का नाम क्या है?

    आकांक्षा पांडा

    हर हर शंभु शिव महादेवा गाने को किसने गाया है?

    अभिलिप्सा पांडा और जीतू शर्मा ने।

    टैगोर हिल राँची | Tagore Hill Ranchi Jharkhand

    Tagore Hill Ranchi:- झारखंड झाड़ – झाखंडो का प्रदेश कहा जाता है, एक ऐसा प्रदेश जहां जंगल, पठार, पहाड़, झाड़, नदी और झरने स्थित हों। झारखंड के क्षेत्र के आधार का निर्माण आर्कियन युग (दो सौ करोड़ पूर्व) की प्राचीन चट्टानों से हुआ है, जिसमें ग्रेनाइट, नीस, और आग्नेय अंतर्वेधन चट्टान प्रमुख हैं। 

    टैगोर हिल राँची का एक बेहद ही खूबसूरत और रमणीय स्थल है जहाँ लोग अपने प्रियजनों के साथ या अपने परिवार के साथ समय व्यतीत करना पसन्द करते हैं। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता मन को सुकून का अहसास करता है। टैगोर हिल राँची के मोरहाबादी में स्थित एक सुन्दर पहाड़ी है। 

    आज के इस Article में हम जानेंगे:-

    • टैगोर हिल क्या है?
    • टैगोर हिल कहां पर स्थित है?
    • टैगोर हिल का इतिहास क्या है?
    • टैगोर हिल कैसे पहुंचे?

    Table of Contents

    टैगोर हिल क्या है?| What is Tagore Hill?

    टैगोर हिल (Tagore Hill) को रांची के लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक माना जाता है। टैगोर हिल झारखंड के प्रमुख भौगोलिक विशेषताओं में से एक है, जो इस जगह की सुंदरता में विविधता के साथ चार चांद लगाती है। यह एक पहाड़ी है जो हरे भरे पेड़-पौधों से सुसज्जित है,इस पहाड़ी की चोटी पर एक View Point बनाया हुआ है जहाँ से आस-पास के क्षेत्रों की झलक वास्तव में देखने लायक है, जिससे यहां आने वाले लोग आकर्षित हुए बिना नहीं रहते हैं।

    Tagore Hill Ranchi Jharkhand

    यह एक छोटी सी पहाड़ी है, जो दिखने में काफी सुन्दर है। इस पहाड़ी में काफी छोटे-बड़े पत्थर भरे पड़े हैं, जिस पर यहां जाने वाले लोग अपने दोस्त-यारों और प्रियजनों के साथ आराम से बैठकर बात-चीत करते हैं, साथ ही आस – पास के दृश्य का नज़ारा देखते हैं।

    टैगोर हिल के चोटी से सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा देखने लायक सबसे खूबसूरत चीजों में से एक है। टैगोर हिल एक पर्यटक स्थल/रमणीय स्थान बनने से पहले यहां गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर के बड़े भाई ज्योतिंद्र नाथ टैगोर का आश्रम था और कहा जाता है की उससे पहले भी यह एक विश्राम गृह हुआ करता था।

    टैगोर हिल कहां पर स्थित है? | Where is Tagore Hill?

    टैगोर हिल, झारखण्ड की राजधानी रांची शहर के उत्तर छोर पर मोरहाबादी नामक स्थान पर स्थित है इस पहाड़ी की समुद्र तल से ऊंचाई लगभग 300 फीट ऊंची है. इसके समीप ही रामकृष्ण मिशन आश्रम, कृषि व्यवसायिक संस्थान, दिव्यायन केंद्र और मोरहाबादी मैदान, बिरसा फुटबॉल स्टेडियम भी स्थित है। यातायात के अच्छी सुविधा होने के कारण इस जगह कोई भी आसानी से ऑटो रिक्शा,कार,बस या साइकिल आदि से आना-जाना कर सकता है।

    टैगोर हिल का इतिहास क्या है?| What is the history of Tagore Hill Ranchi?

    Tagore Hill Ranchi एक ऐतिहासिक पहाड़ी है आइये अब हम इस पहाड़ी की इतिहास पर एक नज़र डालते हैं और इसके इतिहास को जानते हैं:-

    Tagore Hill Ranchi का नामकरण कैसे हुआ?

    भारत के श्रद्धेय कवि और एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुदेव श्री रवींद्रनाथ टैगोर के साथ इस पहाड़ी का एक लंबा इतिहास जुड़ा रहा है। कई जगह पर इस पहाड़ी का उल्लेख है कि रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस पहाड़ी पर गीतांजलि का कुछ अंशों की रचना किये थे। टैगोर हिल पर गुरुदेव श्री रवींद्रनाथ टैगोर भी कुछ दिन प्रवास किये थे। 

    Tagore Hill Ranchi Jharkhand

    टैगोर हिल का नामकरण के पीछे रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई ज्योतिरिंद्रनाथ टैगोर के साथ जुड़ा हुआ है। जो सबसे पहले 1 अक्टूबर 1908 को रांची आए थे और यहां आने के बाद उन्हें मोरहाबादी स्थित पहाड़ी काफ़ी पसंद आ गई तब ये जगह बिलकुल एकदम वीरान था।

    क्योंकि उन दिनों राँची की आबादी उतनी अधिक नहीं थी। तब उन्होंने मोरहाहाबादी के जमींदार हरिहर नाथ सिंह से 290 रुपए के वार्षिक भाड़े पर मोराहाबादी पहाड़ी को लिए थे। बाद में पहाड़ी के साथ 15 एकड़ 80 डिसमिल जमीन को भी लिए और सबको एक साथ अपने नाम पर बंदोबस्ती करा लिए। इसके बाद उन्होंने वीरान पड़े टूटे – फूटे विश्राम गृह को अच्छा से बना कर इसमें रहने लगे।

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    ज्योतिरिंद्रनाथ टैगोर की मृत्यु 4 मार्च 1925 ई. को अपने आश्रम में ही हुआ और उसका अंतिम संस्कार हरमू घाट/ हरमू मुक्तिधाम पर हुआ। बाद में उसका समाधि स्थल पहाड़ी के ऊपर ही बनाया गया। उनके निधन के बाद भी उनके परिवार के कई सदस्य वर्षों तक यहां आते-जाते रहे, जिसके कारण मोरहाबादी पहाड़ी का नाम टैगोर हिल (Tagore Hill) पड़ा। 

    ज्योतिंद्रनाथ टैगोर ने मराठी गीता रहस्य को बांग्ला भाषा में रूपांतरित किया:-

    ज्योतिंद्रनाथ टैगोर ने सन् 1924 में इसी पहाड़ी पर रह कर “बाल गंगाधर तिलक” द्वारा मराठी में लिखित “गीता रहस्य” को बांग्ला भाषा में अनुवाद किया था। यहां इस पहाड़ी पर बहुत ही शांत माहौल रहता था जिसके कारण उसे अनुवाद करने में कोई परेशानियां नहीं होती थीं।

    टैगोर हिल पर Rest House के बनने की कहानी भी दिलचस्प है:-

    टैगोर हिल के बारे में कहा जाता है कि रांची के अंग्रेज प्रशासक लेफ्टिनेंट कर्नल ए. आर. ऑस्ली ने सन् 1842 ई. में मोरहाबादी पहाड़ी पर गर्मियों में रहने के लिए एक छोटा और प्यारा सा विश्राम गृह (Rest House 🏡) बनवाया था। उन्होंने यहां पर सन् 1842-1848 ई. तक रहे, वे हर रोज सुबह में अपने काले घोड़े पर सवार होकर मोरहाबादी मैदान में टहलने के लिए जाते और फिर Rest House में आकर Rest किया करते थे।

    वे यहां पर अपने भाई के साथ रहा करते थे जो किसी अज्ञात कारणों से इसी विश्राम गृह में आत्महत्या (Suicide) कर लिया। इसके बाद से कैप्टेन ऑस्ली का मन यहां पर नहीं लगने लगा, फिर वह यहां से छोड़कर चले गए और दुबारा कभी लौटकर नहीं आए। इसके बाद से ये पहाड़ी काफ़ी वीरान था।

    ज्योतिरिंद्रनाथ टैगोर ने मोरहाबादी पहाड़ी को कब खरीदा?

    Tagore Hill Ranchi के बारे में कहा जाता है कि रांची के अंग्रेज प्रशासक लेफ्टिनेंट कर्नल ए. आर. ऑस्ली ने सन् 1842 ई. में मोरहाबादी पहाड़ी पर गर्मियों में रहने के लिए एक छोटा और प्यारा सा विश्राम गृह (Rest House 🏡) बनवाया था। उन्होंने यहां पर सन् 1842-1848 ई. तक रहे, वे हर रोज सुबह में अपने काले घोड़े पर सवार होकर मोराबादी मैदान में टहलने के लिए जाते और फिर Rest House में आकर Rest किया करते थे।

    Tagore Hill Ranchi Jharkhand

    वे यहां पर अपने भाई के साथ रहा करते थे जो किसी अज्ञात कारणों से इसी विश्राम गृह में आत्महत्या (Suicide) कर लिया। इसके बाद से कैप्टेन ऑस्ली का मन यहां पर नहीं लगने लगा, फिर वह यहां से छोड़कर चले गए और दुबारा कभी लौटकर नहीं आए। इसके बाद से ये पहाड़ी काफ़ी वीरान था।

    ज्योतिरिंद्रनाथ टैगोर ने मोरहाबादी पहाड़ी को कब खरीदा?

    ज्योतिरिंद्रनाथ टैगोर की पत्नी जिनका नाम कादंबरी देवी था जिसकी मृत्यु 19 अप्रैल 1884 को आत्महत्या करने से हुई, जिससे वे काफी दुखी-दुखी रहने लगे। तब से वे अपना पैतृक निवास स्थान ठाकुरबाड़ी छोड़कर अपने बड़े भाई ब्रिटिश भारत के पहले I.C.S सत्येंद्रनाथ टैगोर के साथ कुछ दिन रहे। लेकिन फिर 1905 ई. में अपने पिता महर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर के मृत्यु के बाद उन्होंने कुछ समय एक वैरागी की तरह पूरे भारत का भ्रमण किया। 

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    फिर वह शांति की खोज में रांची आए तब उन्होंने मोराबादी के जमींदार हरिहर नाथ सिंह से 290 रुपए के वार्षिक भाड़े पर मोराहाबादी पहाड़ी को लिए थे। बाद में पहाड़ी के साथ 15 एकड़ 80 डिसमिल जमीन को भी लिए और सबको एक साथ अपने नाम पर बंदोबस्ती करा लिए। इसके बाद उन्होंने वीरान पड़े टूटे-फूटे विश्राम गृह को अच्छा से बना कर इसमें रहने लगे।

    टैगोर हिल पहाड़ी पर किस-किस चीज का निर्माण कराया गया है?

    Tagore Hill Ranchi पहाड़ी पर चढ़ने के लिए सीढ़ियां, प्रवेश द्वार पर एक विशाल तोरण द्वार और साथ ही अनेक छोटा – छोटा मंदिर तथा आगंतुकों को बैठने के लिए चबूतरा का निर्माण कराया गया। द्वार के सामने ही विभिन्न प्रजातियों की चिड़ियां, हिरण, मोर आदि को रखने के लिए एक छोटा आश्रम का रूप दिया गया है।

    वे ब्रह्मा समाजी थे, इसीलिए ध्यान-साधना के लिए एक खुला मंडप बनवाया, जिसका नाम है “शांतालय” रखा गया। ये मंडप चौकोर है, स्लैप बलुवा पत्थर का है, शिखर नागर शैली में बना है। पहाड़ी के नीचे एक सत्येंद्रनाथ ने एक घर बनावाया, जिसका नाम है “सत्यधाम” रखा गया।

    ज्योतिंद्रनाथ टैगोर की डायरी से पता चलता है कि उन दिनों रांची के गण्यमान्य लोग उनके आश्रम आया करते थे तथा साहित्य, संगीत, उपासना आदि कार्यक्रमों में शामिल होते थे। वे यहां के आदिवासियों से काफी प्रेम करते थे, इसी कारण पहाड़ी पर होने वाले सभी प्रकार के कार्यक्रम में वे लोग अवश्य भाग लेते थे।

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    अभी के समय में यहां पर बहुत ही सुंदर-सुंदर झारखंडी चित्रकला तथा मूर्ति कला टैगोर हिल के दीवारों में बनाया गया है, जो यहां के कला-संस्कृति को दिखाता है। यहां स्थित किला, दीवार, मंदिर, शांति स्थल आदि जगहों को बहुत ही अच्छे से रंगाई -पुताई किया गया है।

    Tagore Hill Ranchi पर ब्रोकरों की थी नजर:-

    एक बार 1980 में टैगोर हिल को ब्रॉकरों ने बेचने का प्लान बनाया था, इसे खरीदने के लिए कई बड़े-बड़े बिल्डर लोग खड़े हो गए थे। भूदान योजना समिति बनाम मंदोदरी देवी का मामला L.R.D.C Court में गया। माननीय उच्च न्यायालय ने दोनों के दावे को ख़ारिज कर दिया और कहा कि ये एक ऐतिहासिक स्थल है, इसीलिए इस पर कोई दावा नहीं कर सकता है।

    टैगोर हिल तक कैसे पहुंचें?

    Tagore Hill Ranchi का शानदार सौंदर्य और दृश्य सभी प्रकार के आगंतुकों/पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है। यहां पर लोग रिक्शा, ई – रिक्शा, साइकिल, मोटरसाइकिल, कार, बस, ऑटो रिक्शा, टैक्सी, Ola, Uber, Rapido आदि के माध्यम से टैगोर हिल तक पहुंच सकते हैं। साथ ही देश के अन्य हिस्सों के साथ-साथ विदेशों से भी आने वाले लोग शहर में स्थित बिरसा मुंडा हवाई अड्डा/रांची हवाई अड्डे के माध्यम से भी इस शहर में पहुंच सकते हैं।

    टैगोर हिल तक इन साधनों से आसानी से पहुँच सकते हैं:-

    साधन नजदीक स्थानदुरी/समय
    By AirBirsa Munda International Airport, Ranchi13 Km/(31 min)
    By Train Ranchi Railway Station6.7 Km/(22 min)
    By BusBirsa Munda Bus Terminal, Khadgarha, Ranchi 5.6 Km/(24min)
    By BusGovt Bus Stand, Ranchi6.7Km/(24min)

    Local Transport :- Tagore Hill Ranchi जाने के लिए आप अपने निजी वाहन, Ola, Uber, ऑटो रिक्शा, ई रिक्शा, साइकिल, पैदल से बिलकुल आसानी से पहुंच सकते हैं।

    टैगोर हिल की किन-किन नामों से जाना जाता है?

    Tagore Hill Ranchi को मोरहाबादी पहाड़ी, मोरहाबादी हिल, टैगोर पहाड़ी के नामों से जाना जाता है। आप 200-250 सीढ़ियाँ चढ़कर शीर्ष पर पहुँच सकते हैं और नीचे शहर के आश्चर्यजनक दृश्यों का आनंद ले सकते हैं। इसके अलावा, आप यहां ट्रेकिंग, रॉक क्लाइम्बिंग और कई अन्य साहसिक खेलों और रोमांचकारी गतिविधियों में भी हाथ आजमा सकते हैं।

    पहाड़ी की तलहटी में प्रसिद्ध रामकृष्ण आश्रम और दिव्ययान और कृषि व्यवसायिक संस्थान का केंद्र भी स्थित है। इसके अलावा, आप ऊपर की ओर से भी मंत्रमुग्ध कर देने वाले सूर्यास्त का आनंद ले सकते हैं।

    टैगोर हिल को विकसित करने के लिए कई योजनाएं हुईं निष्फल:-

    Tagore Hill Ranchi परिसर को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए कई योजनाएं बनाई गयीं, लेकिन सभी निष्फल हुईं। झारखण्ड पर्यटन विभाग की ओर से यहां पर रोप वे बनाने की योजना बनी थी परन्तु उस पर कोई काम नहीं हो सका।

    Tagore Hill Ranchi Jharkhand

    2005 में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अर्जुन मुंडा, शिक्षाविद् डॉ रामदयाल मुंडा के साथ टैगोर हिल का भ्रमण करने पहुंचे थे। तब डॉ रामदयाल मुंडा ने मुख्यमंत्री को यहां Open Theater बनवाने का प्रस्ताव दिया था। अर्जुन मुंडा ने इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए पर्यटन विभाग को कहा था, पर इस दिशा में भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।

    Tagore Hill Ranchi राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने के लिए P.I.L भी हो चुका है :-

    SPTN संस्था की ओर से 2017 में इस मामले में Jharkhand High Court में P.I.L दर्ज किया गया था। संस्था के अध्यक्ष अजय कुमार जैन ने बताया कि SAI की ओर से जवाब दिया गया कि Tagore Hill सन् 1925 में बना था और अभी 100 वर्ष पूरे नहीं हुए, इसलिए इसे राष्ट्रीय धरोहर (National Heritage) घोषित नहीं किया जा सकता। फिर एक और जानकारी के अनुसार अजय कुमार जैन ने कोलकाता के National Library में मौजूद “तत्वबोधिनी पत्रिका” के हवाले से बताया कि टैगोर हिल 1910 में बनाए जाने का प्रमाण है।

    Tagore Hill Ranchi को धरोहर घोषित करने के लिए मांगा था एनओसी:-

    Tagore Hill Ranchi को राष्ट्रीय धरोहर (National Heritage) घोषित करने के लिए राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच कई पत्राचार हुए, लेकिन आज तक टैगोर हिल राष्ट्रीय धरोहर घोषित नहीं हो सका। 2001 से प्राकृतिक सौंदर्य व आदिम संस्कृति सरंक्षण संस्थान (Natural Beauty and Primitive Culture Preservation Institute – NBPCPI) लगातार काम कर रहा है।

    2008 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India – ASI) की ओर से दिल्ली केंद्रीय कार्यालय को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने के लिए पत्र लिखा गया था। 2013 में केंद्र से झारखंड सरकार को पत्र भेजा गया, जिसमें राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने के लिए No Objection Certificate – NOC मांगा गया था। 2014 में राज्य सरकार द्वारा ASI को NOC भी मिल गया था, लेकिन इसके बाद कोई कार्रवाई नहीं हुई। 

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    टैगोर हिल को लोग क्यों पसंद करते हैं?

    Tagore Hill Ranchi सुबह 5 बजे से शाम 6 बजे तक खुला हुआ रहता है, जिसका Entry Fee’s बिलकुल Free है। यहां से सुर्यादय और सुर्यास्त की लालिमा वाली दृश्य देखने लायक होती है। इस जगह पर लोग Morning Walk, Running, Rock Climbing, Advantures, Silent Mood, Time Spend, Meet-up करने के लिए आते हैं।

    टैगोर हिल के चोटी पर चढ़ने के लिए लगभग 200-250 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। यही कारण है कि यहां आने वाले लोग कहते हैं कि इससे हमारे घुटने, पैर मजबूत होता है। साथ Denfence की तैयारी करने वाले लड़के बताते हैं कि इस पहाड़ी से हमें बहुत ही अच्छे से तैयारी होती है, कारण यहां बहुत बड़ा – बड़ा चट्टान है जिससे उतरने और चढ़ने का अच्छा अभ्यास हो जाता है।

    Tagore Hill Ranchi के Top View पर जाकर लगभग पुरे रांची की दर्शन कर सकते हैं। सुबह और शाम में आप शुद्ध और ताज़गी हवा ले सकते हैं साथ ही एक शांति का अनुभव कर सकते हैं। यहां आने से आपका मन एक दम शांत हो जायेगा क्योंकि पाहड़ी में चारों ओर हरियाली ही भरा है।

    टैगोर हिल पर आप अपने परिवार वाले के साथ और दोस्तों के साथ घूमने या समय व्यतित करने के लिए जा सकते हैं। यहां आप आप छोटा सा पिकनिक भी कर सकते हैं लेकिन यहां खाना नहीं बना सकते हैं उसके लिए आपको खाना घर से लाना होगा और खाने के बाद कूड़ा – कचरा बकायदा तरीके से कूड़ेदान में डालना होगा। इस जगह पर आपको बिलकुल साफ – सुथरा दिखाई देगा क्योंकि यहां पर साफ – सफ़ाई पर बहुत ध्यान दिया जाता है।

    Conclusion:-

    आज के इस आर्टिकल में हमने आपको बताया कि – Tagore Hill Ranchi/टैगोर हिल क्या है?, टैगोर हिल कहां स्थित है? तथा टैगोर हिल/Tagore Hill Ranchi का इतिहास क्या है? आदि जैसे और भी बहुत कुछ जो आपको जानने लायक हो।

    आपको ये जानकारी कैसी लगी हमें Comment करके ज़रूर बताएं तथा अगर कोई सुझाव देना चाहते हैं तो वो भी Comment में लिख कर बताएं ताकि हम उसे सुधार कर इससे और भी बेहतर कर सकें।

    FAQs:-

    टैगोर हिल का नाम कैसे पड़ा?

    रविंद्र नाथ टैगोर के बड़े भाई ज्योतिंद्र नाथ टैगोर के नाम से मोराबादी पहाड़ी का नाम टैगोर हिल पड़ा।

    टैगोर हिल कहां पर स्थित है?

    मोरहाबादी,रांची,झारखण्ड

    क्या Tagore Hill Ranchi में Entry Fee’s लगता है?

    Fully Free

    क्या Tagore Hill से पूरी रांची देखा जा सकता है?

    जी हां, पुरे राँची को आसानी से देखा जा सकता है.

    Tagore Hill Ranchi जाने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?

    Morning 5-6 A.M or Evening 5-6 यानि आप सूर्यदय और सूर्यास्त के समय इस जगह पर आ सकते हैं।

    टैगोर हिल को किस नाम से जाना जाता है?

    मोरहाबादी पहाड़ी

    Tagore Hill Ranchi में Rest House 🏡 किसने बनवाया था?

    अंग्रेज प्रशासक लेफ्टिनेंट कर्नल ए. आर. ऑस्ली ने सन् 1842 ई. में टैगोर हिल में Rest House House का निर्माण कराया।

    Draupadi Murmu Biography in Hindi | द्रौपदी मुर्मू की जीवनी

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    Draupadi Murmu Biography in Hindi :- देश के सर्वोच्च पद यानी राष्ट्रपति (Persident) पद के लिए 18 जुलाई को मतदान होना है। जिसके लिए भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी, भाजपा के केन्द्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा तथा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (National Democratic Alliance – NDA) सरकार के लोगों से मिलकर 21 जून 2022 (मंगलवार) को एनडीए के ओर से राष्ट्रपति पद के लिए झारखंड के पूर्व राज्यपाल श्रीमती द्रौपदी मुर्मू (Draupadi Murmu) का नाम रखा गया है।

    फिलहाल रामनाथ कोविंद जी का कार्यकाल पूरा होने के बाद अब देश को नया राष्ट्रपति मिल जाएगा। भारतीय जनता पार्टी (BJP) की अगुवाई राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी NDA की ओर से द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद के लिए महिला उम्मीदवार के रूप में चुनी गई हैं तो वहीं विपक्ष की ओर से यशवंत सिन्हा को उम्मीदवार बनाया गया है। अगर द्रौपदी मुर्मू जी जीत जाती हैं तो वो देश के दूसरी महिला तथा देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति होंगी।

    तो चलिए आज के इस आर्टिकल में हमलोग जानेंगे कि इस समय देश के बहुचर्चित नाम द्रौपदी मुर्मू के बारे में (About of Draupadi Murmu), द्रौपदी मुर्मू का जीवन परिचय (Draupadi Murmu Biography), द्रौपदी मुर्मू का राजनीतिक जीवन (Political life of Draupadi Murmu) आदि बहुत सारी जानकारियां जानेंगे जो आपको जानने लायक हो।

    Table of Contents

    द्रौपदी मुर्मू का परिचय :-

    नाम द्रौपदी मुर्मू
    पति का नाम श्याम चरण मुर्मू
    पिता का नाम बिरंची नारायण टुडू
    माता का नाम किनगो टुडू
    जन्म 20 जून 1958
    समुदाय संथाली आदिवासी
    वैवाहिक स्थिति विधवा
    बच्चों की संख्या 3
    दसवीं की पढ़ाईK.B. High School, Mayurbhanj
    इण्टर की पढ़ाईRama Devi Women’s University, Vidya Vihar, Bhubaneswar, Odisha
    ग्रेजुएशन की पढ़ाई Rama Devi Women’s University, Vidya Vihar, Bhubaneswar, Odisha
    नौकरी Junior Assistant ( 1979-1983 )
    अध्यापन Shri Aurobindo Integral Education and Research, Rairangpur
    राजनीतिक कैरियर पंचायत काउंसलर
    2 बार विधायक ( 2000, 2004 )
    पुरस्कार नीलकण्ठ पुरस्कार ( Best MLA of Odisa, 2007 )
    राज्यपाल झारखण्ड ( 15 मई 2015 से लेकर 12 जुलाई 2021 तक )
    Wikipedia Draupadi Murmu

    द्रौपदी मुर्मू का प्रारंभिक जीवन (Early life of Draupadi Murmu) :-

    द्रौपदी मुर्मू का जन्म भारत देश के उड़ीसा राज्य के मयूरभंज जिले रायरंगपुर से करीब 25 किलोमीटर दूर सुदूरवर्ती गांव बैदापोसी के ऊपर बेड़ा में 20 जून 1958 को संताली आदिवासी परिवार में हुई थी। ये काफ़ी गरीब परिवार में जन्मी थी। इनका लालन पालन बहुत ही कम संसाधनों हुआ था। उनके पिता और दादा दोनों ही उनके पैतृक गांव के प्रधान थे।

    द्रौपदी मुर्मू / Draupadi Murmu के पिताजी का नाम बिरंची नारायण टुडू तथा माता जी का नाम किनगो टुडू था। इनके पिता एक गांव के किसान था, जो खेतीबारी कर अपने परिवार का भरण – पोषण करता था। ये अपनी पिताजी के तीन संतानों (2 बेटा और 1 बेटी) में से तीसरी और सबसे छोटी थी। पहला बेटा – भगत टुडू व दूसरा बेटा का नाम – सारणी टुडू तथा बेटी का नाम – द्रौपदी मुर्मू है।

    द्रौपदी मुर्मू की शुरुआती शिक्षा ( Draupadi Murmu’s Early Education ) :-

    बिरंची नारायण टूडू के तीनों बेटा – बेटियों की प्रारंभिक शिक्षा गांव के स्कूल में ही हुआ। इसके बड़े भाइयों की आगे की पढ़ाई तो आर्थिक तंगी की वजह से रुक गई। लेकिन द्रौपदी मुर्मू ने अपनी आगे की पढ़ाई जारी रखना चाही, क्योंकि वो पढ़ने लिखने में ठीक – ठाक थी। इनकी पढ़ाई – लिखाई का योगदान सबसे ज्यादा उनकी दादी का हाथ था। द्रौपदी मुर्मू की दादी जो चक्रधरपुर की रहने वाली थी। वह इनको पढ़ने के लिए काफी प्रेरित की, इनकी दादी तब के समय में हिंदी और इंग्लिश भी बोल लेती थी।

    द्रौपदी मुर्मू के गांव में कुछ सरकारी अधिकारी व मंत्री जी का दौरा हुआ। द्रौपदी मुर्मू ने उनके सामने अपनी आगे की पढ़ाई – लिखाई जारी रखने की इच्छा प्रकट की। उनकी मदद से उनका दाखिला मयूरभंज के K.B. High School में हो गया। इसके बाद वो उसी विद्यालय से 10वीं की परिक्षा उड़ीसा बोर्ड से दी। इसे आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए वो भूवनेश्वर चली गई।

    फिर उन्होंने 12वीं कला (I.A) की पढ़ाई “Rama Devi Women’s University, Vidya Vihar, Bhubaneswar, Odisha” से की और इंटर की परीक्षा उड़ीसा बोर्ड से दी। इन्टर पास करने के बाद उन्होंने उसी कॉलेज से कला (B.A) से स्नातक (Graduation) की ।

    द्रौपदी मुर्म ने Junior Assistant के रूप में की काम।

    शिक्षा पूरी करने के बाद उनका एक ही सोच था कहीं नौकरी करे और अपने परिवार का आर्थिक रूप से मदद कर सके। इसीलिए उन्होंने स्नातक पूरी करने के बाद इन्हें उड़ीसा सरकार में ही बिजली विभाग में Junior Assistant के तौर पर नौकरी प्राप्त हुआ। बिजली विभाग में इन्होंने 1979 से लेकर साल 1983 तक Junior Assistant के तौर पर कार्यरत रही।

    द्रौपदी मुर्मू का वैवाहिक जीवन (Draupadi Murmu’s Married Life) :-

    5 साल नौकरी करने के बाद उनकी शादी हो गई, फिर उनके ससुराल वालों ने उसे नौकरी नहीं करने दिया। क्योंकि उनकी नौकरी को लेकर परिवार में दिक्कतें शुरू हो गई। यही कारण से ससुराल वालों का मानना था कि दोनों लोगों के नौकरी करने की वजह से बच्चों की परवरिश पर बुरा असर पड़ेगा। वो नौकरी को पुरी तरह से छोड़ी नहीं थी यानि वो त्यागपत्र नहीं दी थी।

    Draupadi Murmu's Married Life

    द्रौपदी मुर्मू स्नातक / Graduation की पढ़ाई पूरी करके नौकरी कर रही थी उसी बीच शादी सेट होने के कारण वो अपनी गांव चली आई। उनके लिए घरवाले एक अच्छा – खासा लड़का देखकर कर रखा था। द्रौपदी मुर्मू / Draupadi Murmu की शादी 1983 में मयूरभंज जिले में ही श्याम चरण मुर्मू से हुआ था जो एक बैंक अधिकारी थे। वे गांव की एक सबसे ज्यादा पढ़ी – लिखी लड़की थी, क्योंकि उस समय गांव में इतना पढ़ाई – लिखाई कोई भी व्यक्ति नहीं करता था

    इन दोनों का वैवाहिक जीवन काफी सुन्दर तरीके से चल रहा था किसी में कोई दिक्कत नहीं था। दोनों ने तीन संतानों का जन्म दिया, जिसमें से 2 बेटा और 1 बेटी थी। पहला बेटा का नाम – राम मुर्मू और दूसरा बेटा का नाम – लक्ष्मण मुर्मू तथा बेटी का नाम – इतिश्री मुर्मू है। पति – पत्नी मिलकर मिलकर अपने बाल बच्चों की देखभाल बहुत अच्छे तरीके से कर रहे थे। तीनों बेटा – बेटी को भुवनेश्वर के अच्छा विद्यालय में नामांकरण भी करवा दिया।

    द्रौपदी मुर्मू के बच्चों के नाम :-

    क्रम संख्या नाम
    1राम मुर्मू
    2लक्ष्मण मुर्मू
    3इतिश्री मुर्मू

    बिना वेतन लिए पढ़ाने लगीं एक संस्था में।

    द्रौपदी मुर्मू वैसे भी घर में बैठ कर रहना नहीं चाहती थी और घरवाले उसे दुबारा नौकरी करने नहीं देते, जिसको देखकर वो एक सामाजिक संस्था से जुड़ गई। इस संस्था से जुड़ने का एक ही लक्ष्य था वो अपने गांव और समाज को आगे बढ़ाना और जागरूक करना। वे लोगों को घर – घर जाकर समझती थी और बताती थी की ये काम अच्छा है और ये काम बुरा है।

    एक निर्धन परिवार से संबंध रखने वाली द्रौपदी मुर्मू कभी भी अपने लक्ष्य से नहीं भटकी और हमेशा आगे की ओर अग्रसर होती रही। उनके बारे में कहा जाता है कि आर्थिक तंगी से जूझते हुए भी लोगों को शिक्षित और जागरूक करने का भार लिया और बिना वेतन के ही द्रौपदी मुर्मू ने Aurobindo Integral Education and Research, Rairangpur में सहायक शिक्षिका के तौर पर भी काम की।

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    द्रौपदी मुर्मू का राजनीतिक जीवन (Political Life of Draupadi Murmu) :-

    द्रौपदी मुर्मू का राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1997 से हुआ। वह भाजपा से रायरंगपुर में पहली बार पार्षद चुनी गईं। इसके बाद उन्हें भाजपा की उड़ीसा इकाई की अनुसूचित जनजाति मोर्चा का उपाध्यक्ष बनाया गया। वे 2002 से लेकर 2009 तक मयूरभंज की भाजपा जिलाध्यक्ष रहीं।

    पदअवधि
    उड़ीसा सरकार में (स्वतंत्र प्रभार) के रूप में ट्रांसपोर्ट एवं वाणिज्य विभाग के राज्यमंत्री
    2000-2004
    मयूरभंज विधानसभा से भाजपा का विधायक
    2000-2005
    उड़ीसा सरकार में पशुपालन और मत्स्य पालन विभाग के राज्यमंत्री
    2002-2004
    भाजपा के ST मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य
    2002-2009
    मयूरभंज विधानसभा से भाजपा का विधायक
    2005-2009
    भाजपा के ST मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष
    2006-2009
    ST मोर्चा भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य
    2013-2015
    झारखंड की राज्यपाल 2015-2021

    द्रौपदी मुर्मू को सर्वश्रेष्ठ विधायक का पुरस्कार से सम्मानित :-

    द्रौपदी मुर्मू को उड़ीसा के मयूरभंज विधानसभा ने 2007 में सर्वश्रेष्ठ विधायक के लिए “नीलकंठ पुरस्कार” से सम्मानित किया था।

    झारखंड के पहली महिला राज्यपाल बनी :-

    द्रौपदी मुर्मू , झारखंड की पहली महिला राज्यपाल के रूप में कार्य की। वे झारखंड की सबसे लंबी अवधि तक रहने वाली 9वीं राज्यपाल थीं। और पहली ऐसी राज्यपाल थीं जिन्होंने पूरा 5 साल तक रहने के बावजूद वह अपने पद पर आसीन रहीं। उनका का कार्यकाल का समय 18 मई 2015 से लेकर 12 जुलाई 2021 तक रहा यानि कुल 6 साल 1 महीना और 18 दिन तक था.

    वैसे तो इनका कार्यकाल 5 साल का था लेकिन बीच में वैश्विक महामारी कोविड – 19 आने के कारण राष्ट्रपति इनका कार्यकाल बड़ा कर 6 साल का कर दिया। वह 6 साल 1 माह 18 दिन तक झारखंड की राज्यपाल रहीं। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने झारखंड के सभी विश्वविद्यालयों के लिए Chancellor Portal शुरू कराया।

    अपने राज्यपाल के कार्यकाल के दौरान कभी भी विवादों में नहीं रहीं, जो इन्हें बहुत ही अदभुत बनाता है। अपने पद पर रहते हुए हमेशा आदिवासियों, बालिकाओं तथा अन्य समुदायों के हित की बात करती थीं और सजग रहती थीं। इन्हें राज्यपाल रहते हुए लगभग 100 से अधिक पुस्तकें उपहार के रूप में मिली, जिसे ये काफ़ी संभाल के रखी हुई है।

    झारखंड में भाजपा और झामुमो, कोंग्रेस सरकार के कई विधेयकों को किया वापस :-

    द्रौपदी मुर्मू ने राज्यपाल के कार्यकाल के दौरान झारखंड के विश्वविद्यालयों में एक नया प्रयास किया, जिसका लाभ विद्यार्थियों को मिला। उन्होंने कई विधेयकों को लौटाने का निर्णय भी लिया। भाजपा के रघुवर दास सरकार में ही सीएनटी-एसपीटी संशोधन विधेयक – 1908 (CNT-SPT Amendment Bill – 1908) सहित कई विधेयकों को सरकार को वापस लौटाने का कड़ा कदम भी उठाया।

    हेमंत सोरेन की झामुमो सरकार में भी उन्होंने कई आपत्तियों के साथ जनजातीय परामर्शदातृ समिति के गठन से संबंधित फाइलें लौटा दीं। खूंटी में पत्थलगड़ी की समस्या के समाधान को लेकर वहां के परंपरागत ग्राम सभाओं, मानकी, मुंडा व अन्य प्रतिनिधियों को राजभवन बुलाकर उनके साथ रायशुमारी ली। इन सभी कार्यों के चलते उनकी एक अच्छी पहल भी मानी जाती है।

    द्रौपदी मुर्मू की संघर्ष, दुखों और समर्पण से भरी रही जिंदगी।

    द्रौपदी मुर्मू की जिंदगी काफ़ी संघर्ष, दुखों और समर्पण से भरी रही है, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने सभी बाधाओं को धीरे – धीरे पार कर उस कठिन परीक्षा से पास की। उनके जीवन में ऐसा समय भी आया, जिसमें काफ़ी तनावग्रस्त हो गई। ऐसा लग रहा था मानो वो अब नहीं बचेगी।

    जिसका सबसे पहला कारण था द्रौपदी मुर्मू का सबसे बड़ा बेटा राम मुर्मू का वर्ष 25 अक्टूबर 2010 में 25 साल की उम्र में असमय मृत्यु हो गई। डिप्रेशन से बाहर निकलने के लिए उन्होंने अध्यात्म (Spirituality) का रास्ता को पकड़ ली, जिसके लिए वह ब्रह्मकुमारी संस्था से जुड़ गई। वह जब धीरे – धीरे डिप्रेशन से बाहर आ ही रही थी, कि तभी 02 जनवरी 2013 में एक सड़क दुर्घटना में उनके दूसरे बेटे लक्ष्मण की भी मृत्यु हो गई।

    द्रौपदी मुर्मू के जीवन का कठिन दौर यहीं नहीं रुका। उनके बेटे की मृत्यु के कुछ ही दिन बाद उनकी मां किनगो टुडू की भी मृत्यु हो गई। अपनी मां की मृत्यु के कुछ दिन बाद ही उनके बड़े भाई भगत टुडू का भी मृत्यू हो गया। इसी तरह से उन्होंने मात्र 1 महीने के अन्दर ही अपने परिवार के 3 लोगों को खो दिया। इन सभी दुःख की घड़ी से निकल ही रही थी कि तभी उसके सामने एक बहुत बड़ा पहाड़ टूट गया वर्ष 2014 में उनके पति श्याम चरण मुर्मू का भी आकस्मिक निधन हो गया।

    उनके पति के देहांत होने के बाद द्रौपदी मुर्मू का सामान्य जीवन में वापस लौटना बहुत ही मुश्किल हो गया था। लेकिन उन्होंने ब्रम्हाकुमारी में अध्यात्म के साथ-साथ योग की भी शुरुआत की। जिससे वो अपनी डिप्रेशन से धीरे – धीरे बाहर निकलने लगी। और एक समय ऐसा आया कि वो इस बुरे दौर को पराजित कर अपनी जीत हासिल की।

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    द्रौपदी मुर्मू का समाजसेवी जीवन (Draupadi Murmu’s Social Life) :-

    द्रौपदी मुर्मू ने समाज सेवा के क्षेत्र में काफ़ी बहुमूल्य योगदान दिया। उन्होंने अपने आसपास के गांव घूम – घूम कर शिक्षा का अलख जगाने का काम किया। उन्होंने कई विद्यालय विद्यालय जा – जाकर बिल्कुल मुफ्त में शिक्षा बांटने का काम किया। इसके साथ ही अपने आदिवासी समुदाय को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ाने और अपने समाज के प्रति जागरूक करने का काम किया।

    द्रोपदी मुर्मू अपने क्षेत्र में अच्छे ढंग से काम करने के लिए कई अशासकीय संस्था (Non-Governmental Organization – NGO) के संपर्क में आई। जिसके लिए वह गांव – गांव जाकर जागरूकता अभियान चलाया। इस अभियान के तहत उन्होंने आदिवासियों का खान – पान , रहन – सहन, पढ़ाई – लिखाई, नाच – गान, कमाने – खाने का जरिया आदि उन सभी चीजों के बारे में बताया गया। जिससे कि जगंल – पहाड़ में तथा सुदूरवर्ती गांवों में रहने वाले आदिवासियों का किसी तरह से दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़े।

    आदिवासियों के प्रति इतना समर्पण की भावना को देखते हुए। उनसे कई राजनीतिक दल के लोग मिले और उनसे कहने लगे कि आप बहुत ही अच्छा काम कर रही हो। क्यों न आप राजनीति के क्षेत्र में आएं। सभी लोगों के विचारों को सुनकर द्रोपदी मुर्मू ने सोचा कि सही बात है अगर मैं राजनीति के क्षेत्र में आ गई तो इन सभी कार्यों को और भी अच्छे ढंग से कर सकती हूं।

    द्रौपदी मुर्मू ने अपने ससुराल की जमीन एक विद्यालय के नाम कर दिया है, जिसमें अब छात्र एवं छात्राओं के लिए छात्रावास बने हुए हैं। फिलहाल उस विद्यालय में लगभग 100 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं वहीं छात्रावास में रहकर वो भी बिलकुल मुफ़्त। विद्यालय में बच्चों की संख्या हर साल बढ़ते ही जा रही है।

    यूं ही द्रौपदी को रायरंगपुर के लोग सिर आंखों पर नहीं बिठाते। कुछ तो बात होगी। पति और दो बेटों की मौत के बाद द्रौपदी ने अपने ससुराल पहाड़पुर की सारी जमीन ट्रस्ट बनाकर स्कूल के नाम कर दी। ट्रस्ट का नाम पति और बेटों के नाम पर एसएलएस ट्रस्ट रखा। चार एकड़ में फैला यह स्कूल रेसिडेंसियल है और इसमें कक्षा छह से दसवीं तक की पढ़ाई होती है।

    द्रौपदी मुर्मू की झारखंड के कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों के विधि – व्यवस्था को सुधारा।

    बालिकाओं की शिक्षा को लेकर चिंता दिखानेवाली द्रौपदी मुर्मू ने झारखंड के कुल 302 कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों (Kasturba Gandhi Balika Vidyalaya (KGBV) का भी भ्रमण किया। इस दौरान छात्राओं से रूबरू होते हुए उनकी समस्याओं को जानने का प्रयास किया। बाद में स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग, झारखंड सरकार (Department of School Education and Literacy, Government of Jharkhand) को आवश्यक निर्देश देते हुए उनकी समस्याओं को दूर करने का प्रयास किया।

    द्रौपदी मुर्मू ने झारखण्ड राजभवन में मांसाहार पर रोक लगाई थी।

    द्रौपदी मुर्मू ने अपनी कार्यकाल में राजभवन को पूरी तरह से सादगी बनाकर रखा। वे खुद एक शुद्ध शाकाहारी व्यक्तित्व के लोग हैं। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान पूरे राजभवन परिसर में मांसाहार पर रोक लगाई। राजभवन में रहते हुए भी उनकी सादगी की चर्चा हमेशा से होती रही और आगे भी अपनी सादगी के लिए भी याद की जाएंगी।

    द्रौपदी मुर्मू राज्य के सभी लोगों के साथ संविधानिक रूप से मुलाकात करती थी।

    द्रौपदी मुर्मू का कार्यकाल जितना दिन भी रहा उतना दिन तक झारखंड के सभी लोगों के साथ संवैधानिक रूप से मुलाकात करती थी। वे प्रतिदिन विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधियों तथा अन्य कोई भी लोग किसी समस्या लेकर उनके पास आते थे तो वे सभी लोगों के समस्याओं का समाधान ढूंढने का प्रयास करते थे।

    द्रौपदी मुर्मू अभी बेटी और दामाद के साथ रहती हैं।

    द्रौपदी मुर्मू अपनी बेटी इति श्री को अच्छा से पढ़ाई – लिखाई करवाकर एक बैंक अधिकारी बनवाई। फिलहाल इतिश्री भुवनेश्वर में यूको बैंक में मैनेजर के तौर पर काम करती हैं। उनकी शादी गणेश हेमब्रम के साथ 6 मार्च 2015 को हुई थी। अभी इन दोनों की एक बेटी है जिसका नाम आद्याश्री है।

    द्रौपदी मुर्मू अपनी आंखें दान में दी।

    द्रौपदी मुर्मू ने साल 2016 में रांची के Kashyap Memorial Eye Hospital द्वारा आयोजित किए गए Run Of Vision कार्यक्रम में अपनी आंखें दान करने की घोषणा भी की थी।

    देश की पहली आदिवासी और दूसरी महिला राष्ट्रपति होंगी द्रौपदी मुर्मू :-

    द्रौपदी मुर्मू अगर राष्ट्रपति का चुनाव जीतती हैं तो वे देश की पहली आदिवासी और दूसरी महिला राष्ट्रपति बनेंगी। इससे पहले प्रतिभा देवी सिंह पाटिल जो कि देश की एकमात्र महिला राष्ट्रपति रही हैं। वह साल 2007 से 2012 तक भारत के राष्ट्रपति के पद पर रही थीं। द्रौपदी मुर्मू झारखंड की पहली महिला राज्यपाल रह चुकी हैं।

    द्रौपदी मुर्मू का साक्षात्कार (Interview of Draupadi Murmu)

    द्रौपदी मुर्मू ने अपने एक इंटरव्यू में बताई कि :-

    मैं एक आदिवासी संथाली समाज से आती हूं। मेरा जन्म अत्यंत ही गरीब परिवार में हुआ। हमलोग 3 भाई – बहन थे, जिसमें से मैं सबसे छोटी थी। मेरे पिताजी और दादाजी गांव के प्रधान हुआ करते थे। मेरी दादी थोड़ी बहुत पढ़ी हुई थी, जिसे से वो हल्की – हल्की हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में बोल लेती थी। उनकी दादी चक्रधरपुर की रहनेवाली थीं ।

    द्रौपदी मुर्मू , पूर्व राजयपाल ,झारखण्ड

    मैं ने अपनी शुरुवाती पढ़ाई गांव के विद्यालय से ही की। बाद में कुछ सरकारी आधिकारियों के सहयोग से मयूरभंज के एक उच्च विद्यालय में दाखिला हो गया। वहीं से मैं अपनी 10वीं की परीक्षा उड़ीसा बोर्ड से दी फिर मैं ने आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए राज्य की राजधानी भूवनेश्वर चली गई। वहां से मैंने Rama Devi Women’s College में 12वीं उड़ीसा बोर्ड से कला (I.A) तथा कला से स्नातक (B.A) की पढ़ाई पूरी की।

    द्रौपदी मुर्मू , पूर्व राजयपाल ,झारखण्ड

    फिर मैं कुछ साल उड़ीसा सरकार में सिंचाई एवं बिजली विभाग में Junior Assistant Clerk के रूप में कार्य कर रही थी। क्योंकि मेरा मकसद था पैसा कमाकर अपने परिवार को आर्थिक सहायता कर सकूं। फिर एक दिन मेरी शादी हो गयी । मेरे पतिदेव सराकारी बैंक अधिकारी थे। हम दोनों का 3 बेटा – बेटी हुए। शादी के बाद मुझे नौकरी करने नहीं दिया गया कारण ससुराल वालों का मानना था कि अगर दोनों लोग नौकरी करोगे तो अपने बाल – बच्चों का लालन – पालन अच्छे ढंग से नहीं कर सकते।

    द्रौपदी मुर्मू , पूर्व राजयपाल ,झारखण्ड

    मुझे ऐसे ही घर बैठे मन नहीं लगता था तो मैं एक गांव के पास ही एक संस्था Aurobindo Integral Education and Research, Rairangpur से जुड़ गई। फिर मैंने बच्चों को फ्री में पढ़ाना शुरू की। वहीं से मैं समाज सेवा कार्य करने लगी। मुझे देखकर गांव के लोग अपने बेटी को पढ़ना – लिखना शुरू किया और यही कारण है आज उड़ीसा में महिलाओं को 50% का आरक्षण प्राप्त है।

    द्रौपदी मुर्मू , पूर्व राजयपाल ,झारखण्ड

    मैं 1997 में पहली बार रायरंगपुर नगर पंचायत के काउंसलर का चुनाव लड़ी जीत गई। फिर मुझे मयूरभंज विधानसभा से दो बार विधायक का टिकट मिला 2000 और 2004 में दोनों बार मुझे जीत हासिल हुई। इसके बाद मुझे BJD और BJP गठबंधन के मंत्री भी बनाया गया। फिर मैंने तीसरी बार BJP से 2009 में चुनाव लड़ी उस समय BJD अकले ही लड़ा और उस समय मुझे हार का सामना करना पड़ा।

    द्रौपदी मुर्मू , पूर्व राजयपाल ,झारखण्ड

    मैं चुनाव हारने के बाद गांव आ गई। मगर इसी बीच 2010 में मेरे बड़े बेटे की संदेहास्पद मौत हो गई, जिससे मैं काफ़ी डिप्रेशन में चली गई। 2013 में दूसरे बेटे की हादसे में मौत हो गई और 2014 में पति को भी खो दिया। इसके बाद पूरी तरह से टूट गई पर हिम्मत जुटा कर खुद को समाज सेवा में झोंके रखा।

    द्रौपदी मुर्मू , पूर्व राजयपाल ,झारखण्ड

    फिर मुझे 2015 में झारखंड के 9वीं राज्यपाल के रूप में कार्य करने का मौक़ा मिला जिससे मैं बड़ी ही अच्छे तरीके से कार्य को किया। अब मुझे सूबे के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने राष्ट्रपति पद के लिए चुना जिससे मैं कभी नहीं भुला सकती। अगर मैं चुनाव जीत जाती हूं तो देश की सेवा बहुत ही निष्ठा पूर्वक करूंगी।

    द्रौपदी मुर्मू , पूर्व राजयपाल ,झारखण्ड

    निष्कर्ष (Conclusion)

    आज के इस आर्टिकल में हमने जाना कि – द्रौपदी मुर्मू के बारे में (About of Draupadi Murmu), द्रौपदी मुर्मू का जीवन परिचय (Draupadi Murmu Biography), द्रौपदी मुर्मू का राजनीतिक जीवन (Political life of Draupadi Murmu) आदि बहुत सारी जानकारियां जो आपको जानने लायक हो।

    जानकारी कैसी लगी आप हमे Comments में या Instagram में बता सकते हैं। अगर आप हमें कुछ सुझाव या प्रतिक्रिया देना चाहते हैं तो आप Comments में या Instagram में बता सकते हैं , हमें आपके सुझावों और प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा।

    Draupadi Murmu’s FAQ’s :-

    द्रौपदी मुर्मू कौन हैं ?

    द्रौपदी मुर्मू उड़ीसा राज्य के मयूरभंज जिले के संथाली आदिवासी परिवार में जन्मी एक बहुत चर्चित महिला का नाम है। जिन्होंने एक बार पार्षद, दो बार विधायक तथा एक बार झारखंड की राज्यपाल बनी और अब राष्ट्रपति पद के लिए नामित हैं।

    द्रौपदी मुर्मू कौन से धर्म से सम्बन्ध रखती हैं ?

    सारना धर्म जिसको हिन्दू धर्म का ही एक अंग माना जाता है।

    द्रौपदी मुर्मू के गांव का नाम क्या है?

    बैदापोसी (उपरबेड़ा), रायरंगपुर, मयूरभंज

    द्रौपदी मुर्मू का Postal Address क्या है?

    At – Baidaposhi, Ward No-2, P.O – Rairangpur, Dist – Mayurbhanj, State – Odisha, Pin Code – 757043

    द्रौपदी मुर्मू के पिताजी और माताजी का क्या नाम है?

    पिताजी – बिरंची नारायण टुडू और माताजी – किनगो टुडू

    द्रौपदी मुर्मू का संपति कितना है?

    लगभग 10 करोड़ रुपए

    द्रौपदी मुर्मू ने कब राज्यपाल के पद पर शपथ ग्रहण की?

    18 मई 2015

    द्रौपदी मुर्मू किस राजनितिक पार्टी से जुड़ी हुईं हैं?

    भारतीय जनता पार्टी (BJP)

    द्रौपदी मुर्मू का उम्र क्या है?

    64 साल

    द्रौपदी मुर्मू का जन्म कब हुआ था ?

    20 जून 1958

    भारत की पहली महिला राष्ट्रपति कौन हैं ?

    प्रतिभा देवी सिंह पाटिल

    द्रौपदी मुर्मू के पति का क्या नाम है?

    श्याम चरण मुर्मू

    द्रौपदी मुर्मू की बेटी का क्या नाम है?

    इति श्री

    सरहुल पर्व का महत्त्व और इतिहास | Sarhul Parv

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    सरहुल पर्व का महत्त्व और इतिहास :- झारखंड राज्य एक प्रकृति उपासक और पूजक राज्य है, यहां सभी प्रकृति से जुड़े चीज़ों की भगवान के रूप में पूजा की जाती है। सरहुल पूजा भी प्रकृति से जुड़ा हुआ पर्व है इसमें साल ( सखूवा ) के पेड़ की पूजा की जाती है।

    यह पूजा खास कर आदिवासियों का सबसे बड़ा पर्व है। लेकिन इस पर्व को सिर्फ़ आदिवासी ही नहीं बल्कि झारखण्ड के सभी लोग भी बड़ी आस्था और विश्वास के साथ मनाते हैं।

    Table of Contents

    सरहुल पर्व (Sarhul Parv) कब मनाया जाता है?

    सरहुल पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के तृतीया दिन से मनाया जाता है। इस समय बसंत ऋतु चल रहा होता है जिसके कारण पृथ्वी के सभी पेड़ – पौधे में नए – नए फूल – पत्ते से भर जाते हैं। इस समय पूरी पृथ्वी रंग – बिरंगे रंगों से सजी हुई रहती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति ने धरती का श्रृंगार किया हो।

    हमारे देश में बसंत ऋतु को खुशियों का संदेश माना जाता है, क्योंकि इस पुरी पृथ्वी में एक नये उमंग का संचार होता है। सभी के घर फसलों से और जंगल फलों और फूलों से भर जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस समय प्रकृति अपने गोद में बसे किसी जीव – जंतु को भूखा नहीं रहने देती है। सरहुल नए साल का शुरुआत का प्रतीक है, इस पर्व को मनाने के बाद ही आदिवासी – मुलवासी समुदाय के लोग पेड़ – पौधे में आए नए फल – फूल – पत्तियों का सेवन करते हैं।

    सरहुल पर्व पर मछली और केकड़ा का क्या महत्व है?

    सरहुल पूजा के ठीक एख दिन पहले मछली और केकड़ा पकड़ने का रीति – रिवाज है, इसको घर के दामाद या बेटा पकड़ कर अपने घर लाते हैं और उसे पूजा वाले स्थान में आरवा धागा से बांध कर टांगा दिया जाता है। धान बुआई के समय मछली और केकड़ा के चूर्ण को गोबर के साथ मिलाकर बिहन गाड़ी (जिस जगह धान बोया जाता है) में छितरा दिया जाता है।

    यह मान्यता है कि जिस तरह केकड़े और मछली के असंख्य बच्चे होते हैं ठीक उसी तरह धान की बालियां भी असंख्य होंगी। पौराणिक कथाओं के अनुसार मछली और केकड़ा पृथ्वी के पूर्वज है। समुन्द्र के मिट्टी को ऊपर लाकर ही हमारी पृथ्वी बनी है, जिसका प्रयास मछली और केकड़ा ने भी किया था। इसीलिए सरहुल का पहला दिन उनके सम्मान के लिए समर्पित होता है।

    सरहुल पर्व (Sarhul Parv) कैसे और क्यों मनाया जाता है?

    सरहुल पूजा के पूर्व संध्या से पूजा के अंत तक पाहान उपवास करता है। पूजा के एक सप्ताह पहले ही गाँव की “डाड़ी/चूआं (एक तरह का छोटा कुआं)” की साफ – सफाई की जाती है तथा उसके ऊपर ताजा सखुवा की डालियों को काट कर डाल दिया जाता है, जिससे पक्षियाँ और जानवर वहाँ से जल न पी सकें और ये जल बिलकुल शुद्ध रहे।

    सरहुल पर्व का महत्त्व और इतिहास

    पूजा के दिन भोर में ही यानि मुर्गा बांगने के पहले ही पहान दो नये घड़ों में “डाड़ी/चूआं ” का शुद्ध जल भर कर बिना किसी से बात किए सबकी नजरों से बचाकर गाँव को रक्षा करने वाली सरना मां के चरणों में रखता है। फिर सुबह में गाँव के नवयुवक सांढ़ा (मुर्गा) लेकर आते हैं, इन सभी मुर्गों का रंग नियम के अनुसार अलग-अलग होते हैं।

    सृष्टिकर्ता सिंग बोंगा के लिए – सफ़ेद मुर्गा, हातु बोंगा (ग्राम देवता) के लिए – लाल मुर्गा, इकिर बोंगा (दरहा – देशाउली) के लिए – माला मुर्गा, भूत – प्रेत के लिए – काला मुर्गा और हड़म बूढ़ी (पूर्वजों) के लिए – रंगीली मुर्गे का बलि दी जाती है।

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    गांव के पाहान सरना पूजा स्थल में बैठकर पूजा करते हैं। गाँव के पाहान के सहयोगियों द्वारा पासवान के माथे पर सिंदुर का तिलक लगाया है, उसके बाद पानी के घड़ा को पाहन देख कर बताते हैं कि इस साल कैसी बारिश होगी। ठीक उसके बाद सभी लोग “बरसो-बरसो” कहकर शोर करते हैं, बोला जाता है कि यह धरती और आकाश के बीच शादी का प्रतीक है।

    पूजा में पाहान एक – एक करके सारे मुर्गों को बलि चढ़ते हैं। पहान सखूआ/सरई गाछ को सिंदुर लगाता और अरवा धागा से तीन बार लपेटता है, जो शादी के वस्त्र देने का प्रतीक है। सभी मुर्गे का खिचड़ी बनाया जाता है, जिसे “मुर्गा खिचड़ी” कहते हैं। खिचड़ी तथा हड़िया परसाद के रुप में वहां उपस्थित सभी लोगों को बांटा जाता है।

    वहां उपस्थित सभी लोग साल फूल के छोटी – छोटी डालियां अपने – अपने घर ले जाते हैं और उसको दरवाज़ा में लगा देते हैं। फिर सभी लोग शाम में सरना स्थल के आखाड़ा में ढोल – नगाड़े – मंदार के साथ जमा होते हैं और रात भर नाच – गान का माहौल बना रहता है। तीसरे दिन पाहान के द्वारा फुलखोंसी का कार्यक्रम चलाया जाता है, जिसमें पाहान गांव के प्रत्येक घर जाकर सभी को सरई फूल कान में और माथा पर सिंदुर का टीका लगता है।

    फिर शाम में विसर्जन जुलूस निकाला जाता है, जिसमें सभी कोई नाचते – गाते निर्धारित स्थान में जाते हैं उसके बाद नजदीकी तालाब, नदी में सभी पूजा सामग्री को प्रवाहित कर दिया जाता है। चौथे दिन के शाम को सभी आखाड़ा स्थल में आकर आखाड़ा मिटाने के नाम से नाच – गान करके त्योहार समाप्ति की घोषणा किया जाता है।

    सरहुल पर्व (Sarhul Parv) में सरई फूलों का प्रयोग क्यों किया जाता है?

    सरहुल प्रकृति से जुड़ा हुआ एक बहुत बड़ा पर्व है, जिसमें मुख्य रुप से साल/सरई के पेड़ को पूजा किया जाता है। आदिवासियों का मानना है कि इस पर्व को मुख्य रूप से सरई फूलों के साथ मनाया जाता है। पतझड़ के मौसम में पेड़ों के टहनियां पर नए – नए पत्ते और फूल खिलते हैं। इस दौरान साल के पेड़ों पर खिलने वाले फूलों का विशेष महत्व है। यह पर्व मुख्यतः 4 दिनों तक मनाया जाता है, जो चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया से प्रारंभ होता है।

    सरहुल पर्व का महत्त्व और इतिहास

    सरहुल दो शब्दों से मिलकर बना है :- सर और हूल जिसे अंग्रेजी में andlsquo और andrsquo कहते हैं। जिसमें सर का अर्थ है:- सरई फूल और हूल का अर्थ है क्रांति, इसका मतलब सरई फूलों की क्रांति को सरहुल कहा गया। झारखंड के आदिवासी-मूलवासी के जन – जीवन में साल/सखुआ पेड़ की अति महत्त्व है। सरई की पत्ती, टहनी, डालियाँ, तने, छाल, फल, फूल आदि सब कुछ प्रयोग में लाए जाते हैं। सरई पत्तियों का उपयोग पत्तल, दोना, पोटली आदि बनाने में होता है।

    साथ ही दातवुन, जलावन, मड़वा-छमड़ा, शादी-बिहा, भाग्य देखने आदि में सखुए की डाली, टहनी, पत्ता, लकड़ी का उपयोग किया जाता है। इसका उपयोग के बिना आदिवासी – मूलवासी का जन- जीवन की कल्पना करना लगभग असम्भव-सा है। आदिवासी – मूलवासी के जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु के बाद भी सरई पेड़ का विशेष स्थान है। पारखी मीकर रोशनार के द्वारा लिखा गया पुस्तक “द फ़्लाइंग हॉर्स ऑफ धर्मेस” जिसमें आदिवासी जनजीवन और खानपान के ऊपर है। सरई का पेड़ आदिवसियों के लिए सुरक्षा, शांति, खुशहाल जीवन का प्रतीक माना गया है।

    सरहुल को किस-किस भाषा में क्या-क्या बोला जाता है?

    सरहुल पर्व को झारखण्ड के अलग -अलग भाषा में इन नामों से जाना जाता है :-

    भाषापर्व का नाम
    मुण्डारी बा या बाहा
    संथालीबा या बाहा
    कुड़ुखखद्दी या खे़खे़ल बेंजा
    खड़ियाजोनकोर
    पंचपरगनियासरहुल
    कुड़मालीसरहुल
    खोरठासरहुल
    नागपुरीसरहुल

    सरहुल में हड़िया का क्या महत्व है?

    सरहुल पुजा के लिए आदिवासी समाज के प्रत्येक घर से हड़िया बनाने के लिए 3-4 दिन पहले ही चावल जमा किए जाते हैं ताकि पूजा के दिन से हड़िया पूरी तरह से बनकर तैयार हो जाए। यही हड़िया पूजा के दिन सबसे पहले सरना मां को चढ़ा कर फिर सबको परसाद के रूप में दिया जाता है।

    सरहुल कौन समुदाय के लोग मानते हैं?

    सरहुल पूजा खास कर आदिवासियों का सबसे बड़ा त्यौहार है। लेकिन इस पर्व को आदिवासी समुदाय के लोगों के आलावा झारखण्ड सभी मूलवासी लोग भी बड़ी धूम – धाम से मानते हैं।

    सरहुल में पूजा कौन करता है?

    गांव के मुख्य पाहान के द्वारा सरहुल पूजा किया जाता है। सभी धार्मिक अनुष्ठान पहान के द्वारा संचालित किया जाता है।

    सरहुल में लाल और सफ़ेद रंग का क्या महत्व है?

    झारखंडी भाषा-संस्कृति के प्रति अभिमान पैदा करनेवाले डॉ रामदयाल मुंडा के द्वारा कहा गया कथन – “जे नाची से बांची” यानि जो नाचेगा वही बचेगा क्योंकि नृत्य ही संस्कृति है। सरहुल पर्व में पूरे झारखंड में जगह-जगह नाच गाना का माहौल होता है, जिसमें सभी लोग झूमते गाते रहते हैं।

    इस पर्व में लड़की तथा महिलाएं लाल पाढ़ साड़ी पहनती हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि सफेद रंग पवित्रता और शालीनता का प्रतीक, वहीं लाल रंग संघर्ष का प्रतीक माना जाता है। सफेद रंग आदिवासियों का सर्वोच्च देवता सिंगबोंगा और लाल रंग बुरुबोंगा का प्रतीक है। यही कारण है कि सरना झंडा का रंग भी लाल और सफेद ही होता है।

    मुंडारी में एक कथन है – ” सेनगे सुसुन, काजिगे दुरंग ” जिसका अर्थ – चलना ही नृत्य और बोलना गीत है, यही आदिवासियों का जीवन है। झारखंड के सभी लोग बहुत ही सीधा – साधा और मेहनती होते हैं, ये लोग किसी के वश में रहना नहीं जानते हैं।

    सरहुल पर्व में प्रयुक्त कुछ प्रतीकों पर गौर किया जाए तो आपको पता चलेगा कि आदिवासियों की प्रकृति प्रेमी, अध्यात्मिकता, सर्वव्यापी ईश्वरीय उपस्थिति का एहसास, ईश्वरीय उपासना में सृष्टि की सब चीजों, जीव- जन्तुओं आदि का सामंजस्यपूर्ण सहअस्तित्वा का मनोभाव निखर उठता है।

    मुंडारी समाज के लोग बहा पोरोब में क्या करते हैं?

    मुंडा समाज में बहा पोरोब का विशेष महत्व है। मुंडा लोग प्रकृति के पुजारी हैं। सखुआ या सरजोम वृक्ष के नीचे मुंडारी खूंटकटी भूमि पर मुंडा समाज का पूजा स्थल सरना होता है। सभी धार्मिक नेग नियम इसी सरना स्थल पर पाहान द्वारा संपन्न किया जाता है।

    जब सरई पेड़ की डालियों पर सरई फूल भर जाते हैं, तब गांव के लोग एक निर्धारित तिथि पर बहा पोरोब मनाते हैं। बहा पोरोब के पूर्व से पाहान पुजार उपवास रखता है। यह पर्व विशेष तौर पर पूर्वजों के सम्मान में मनाते हैं, धार्मिक गति विधि के अनुसार सबसे पहले सिंगबोगा परम परमेश्वर को फिर पूर्वजों और ग्राम देवता की पूजा की जाती है। पूजा की समाप्ति पर पाहन को सरहुल गीत गाते हुए नाचते-गाते उसके घर तक लाया जाता है।

    क्या सरहुल पूजा में मौसम की भविष्‍यवाणी होती है?

    सरहुल पर्व के दिन सृष्टि के दो महान स्वरूप शक्तिमान सूर्य एवं कन्या रूपी धरती का विवाह होता है। उरांव संस्कृति में सरहुल पूजा के पहले तक धरती कुंवारी कन्या की भांति देखी जाती है। इससे पहले धरती से उत्पन्न नए फल-फूलों का सेवन बिलकुल वर्जित होता है, इस नियम को कठोरता से पालन किया जाता है। इसी दिन सरना स्थल में पूजा करने वाले पाहान के द्वारा घड़े का पानी देखकर बारिश की भविष्यवाणी करते हैं, जो बिलकुल सच साबित होता है।

    सरहुल का संदेश :- परबों का सिरोमणि – सरहुल, हम सबके लिए नवजीवन, आशा, खुशी, सम्पन्नता, पवित्रता और एकता का त्यौहार बनकर आता है। सरहुल का पर्व हमें पर्यावरण को बचाने का संदेश देता है। आदिवासियों के पर्यावरण संरक्षण संबंधित पर्व – त्योहार से पूरी दुनिया को सीख लेने की जरूरत है।

    निष्कर्ष:-

    आज के इस Article में हमने जाना कि – सरहुल पर्व कब मनाया जाता है?, सरहुल पर्व कैसे और क्यों मनाया जाता है?, मुंडारी समाज के लोग बहा पोरोब में क्या करते हैं? आदि बहुत सारी जानकारियां आपके साथ साझा किए जो आपको जानने लायक हो।

    आपको ये जानकारी कैसी लगी हमें Comment करके ज़रूर बताएं तथा अगर कोई सुझाव देना चाहते हैं तो वो भी Comment में लिख कर बताएं ताकि हम उसे सुधार कर इससे और भी बेहतर कर सकें।

    FAQs:-

    सरहुल पर्व (Sarhul Parv) कब मनाया जाता है?

    सरहुल पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के तृतीया दिन से मनाया जाता है।

    Sarhul Parv पर मछली और केकड़ा का क्या महत्व है?

    यह मान्यता है कि जिस तरह केकड़े और मछली के असंख्य बच्चे होते हैं ठीक उसी तरह धान की बालियां भी असंख्य होंगी। पौराणिक कथाओं के अनुसार मछली और केकड़ा पृथ्वी के पूर्वज है। समुन्द्र के मिट्टी को ऊपर लाकर ही हमारी पृथ्वी बनी है, जिसका प्रयास मछली और केकड़ा ने भी किया था। इसीलिए सरहुल का पहला दिन उनके सम्मान के लिए समर्पित होता है।

    सरहुल में पूजा कौन करता है?

    गांव के मुख्य पाहान के द्वारा सरहुल पूजा किया जाता है। सभी धार्मिक अनुष्ठान पहान के द्वारा संचालित किया जाता है।

    सरहुल कौन समुदाय के लोग मानते हैं?

    सरहुल पूजा खास कर आदिवासियों का सबसे बड़ा त्यौहार है। लेकिन इस पर्व को आदिवासी समुदाय के लोगों के आलावा झारखण्ड सभी मूलवासी लोग भी बड़ी धूम – धाम से मानते हैं।

    Netarhat – Queen of Chhotanagpur

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    Netarhat – Queen of Chhotanagpur :- हमलोग जैसे ही किसी पहाड़ी पर्यटन स्थलों का नाम लेते हैं तो हमारे जेहान में “शिमला और मनाली” का नाम आ ही जाता है। लेकिन हमारे झारखंड में भी एक ऐसी पहाड़ी पर्यटन स्थल है जिसे आप देखेंगे तो बाकि पर्यटन स्थलों (Tourists Place) भुल जाएंगे। वह है :- नेतरहाट – छोटानागपुर की रानी ( Netarhat – Queen of Chhotanagpur ) या ( Netarhat – The Hill Station of Jharkhand ) ।

    Netarhat - Queen of Chhotanagpur

    हम बात कर रहे हैं झारखंड (छोटानागपुर) के लातेहार जिले के खूबसूरत वादियों में बसे ” नेतरहाट / Netrahat ” के बारे में। जिसे लोग प्राकृतिक सुंदरता के कारण “पहाड़ों की मल्लिका (Queen of Mountains)” तथा “छोटानागपुर की रानी (Queen of Chhotanagpur)” भी कहते हैं।

    दोस्तों चलिए आज के इस Article में हम जानेंगे कि :- 

    • Netarhat कहां स्थित है ?
    • नेतरहाट का इतिहास क्या है ? 
    • Netarhat कैसे पहुंचे ?
    • नेतरहाट / Netarhat का मौसम कैसा रहता है ? 
    • Netarhat के सामने कौन सा पर्यटन स्थल है ? 

    Table of Contents

    नेतरहाट कहां स्थित है ? Where is Located Netarhat ?

    नेतरहाट, झारखंड (छोटानागपुर पठार) के लातेहार जिला में स्थित है। झारखण्ड जो अपने खनिज सम्पदा और प्राकृतिक संसाधनों के लिए देश ही नहीं वरन विदेशों में भी प्रशिद्ध है। जब भी आप झारखण्ड घूमने का सोचते हैं तो आपके मन में जरूर एक बार इस जगह :- नेतरहाट – छोटानागपुर की रानी ( Netarhat – Queen of Chhotanagpur ) या ( Netarhat – The Hill Station of Jharkhand ) का ख्याल जरूर आता होगा।

    Netarhat झारखण्ड की सबसे सुन्दर और मनभावन जगह है जहाँ पर लोगों का ताँता लगा रहता है , खास कर यहाँ का सूर्योदय और सूर्यास्त को देखना बहुत ही सुन्दर और आनंद का एहसास करता है। साथ ही साथ Netarhat की प्राकृतिक दृश्य आपको अपने और अनायास ही आकर्षित करती है।

    नेतरहाट कैसे पहुंचे ? How to Reach Netarhat ?

    रांची – घाघरा रोड से आप आसानी से नेतरहाट पहुंच सकते हैं । मैदानी इलाकों से होते हुए Netarhat पहुंचना मस्ती भरे सफर का हिस्सा होता है। यह जगह अपने अंदर प्रकृति की सभी सुंदरताओं को संजोये हुए है तथा शैलानियों के स्वागत में हमेशा बांहें फैलाये तैयार रहता है। Netarhat की खड़ी – खड़ी पहाड़ियाँ उसमें से ज्यादातर साल, पलाश, केंदु, नीलगिरी, चीड़, नाशपाती और महुआ के पेड़ों से आच्छादित हैं।

    Netarhat - Queen of Chhotanagpur

    खड़ी पहाड़ी सड़क (घाटी वाली सड़क) जंगलों के बीचों – बीच में अवस्थित है जो काफ़ी तीखे मोड़ों से होकर गुजरती हुयी आगे बढ़ती है। फिर एक जगह पर पहुँचते हैं जहां पर सरू और देवदार के पेड़ों के बीच 3,696 फीट (1,250 मीटर) की ऊंचाई पर नेतरहाट स्थित है। यहाँ एक विशाल, सुन्दर और सुसज्जित स्वागत द्वार नेतरहाट / Netarhat में आपका स्वागत करता है। यहाँ पर जो भी आता है यहाँ के प्रसिद्व Netarhat विद्यालय, लोध झरना, उपरी घाघरी झरना तथा निचली घाघरी झरना देखना नही भूलते है।

    नेतरहाट का इतिहास क्या है ? History of Netarhat ?

    भारत देश के झारखण्ड राज्य के लातेहार जिले के दक्षिण-पूर्व दिशा में और झारखंड की राजधानी रांची से 156 किमी पश्चिम में लातेहार जिले में नेतरहाट / Netarhat स्थित है। जिसे प्रकृति ने भी फुरसत से संवारा और सजाया है। ऊँचे – निचे पहाड़ियों, हरे – भरे जंगलों और झर – झर गिरती पहाड़ी झरनों से घिरा Netarhat काफ़ी आकर्षक और मनमोहक है यहां का प्राकृतिक सौंदर्य ऐसा है कि लोगों को नेतरहाट की वादियां बिलकुल धरती पर स्वर्ग होने का एहसास दिलाती हैं। 

    जो कोई भी यहां पर एक बार चला जाए, उसे बार – बार जाने का जी ललचाए ।

    Netarhat – छोटानागपुर की रानी

    जो भी एक बार नेतरहाट घूमने जाता है वह जिदंगी भर यहाँ पर बिताये अनमोल पलों को नहीं भूल पाता है। यही कारण है कि यहां पर आए ब्रिटिश अधिकारियों का ये काफ़ी पसंदीदा स्थान था। ये स्थान बहुत ही सुन्दर तथा आरामदायक है जिसके चलते अंग्रेज लोग यहां ठहरना पसंद करते थे। यहां का मौसम ठण्ड रहता यही कारण है की लोगों ने इसे Netarhat – छोटानागपुर की रानी ( Netarhat – Queen of Chhotanagpur ) या ( Netarhat – The Hill Station of Jharkhand ) का नाम दिया है । नेतरहाट का तापमान साल भर रांची की तुलना में ठंडा रहता है। यह कहा जा सकता है कि यह स्थान पूरे झारखंड राज्य में सबसे ठंडा स्थान है।

    समुद्री तट से नेतरहाट / Netarhat की ऊंचाई 3,696 फीट (1,250 मीटर) है। ये पहाड़ी क्षेत्र है जिसके चलते इस इलाके में बहुत सारे Waterfalls हैं तथा अधिकतर हिस्से में घने जंगलों का फैलाव है। इस घने जंगल में मिलने वाले कुछ प्रमुख वृक्ष हैं – सागवान, सखुआ, पलाश, महुआ और बांस।

    नेतरहाट का अर्थ ? Meaning Of Netarhat ?

    नेतरहाट शब्द की उत्पति मूलतः ‘नेतुर और हातु’ शब्द के मिलने से हुआ है। नेतुर का अर्थ होता है बांस और हातु का मतलब बाजार। लोगों का कहना है कि यहां कभी बांस का बाजार लगा करता था। इसी कारण इसका नाम नेतरहाट पड़ा। कहावत यह भी है कि अंग्रेजी के शब्द नेचर और हार्ट आपस में मिलकर Netarhat बन गए। नेतरहाट / Netarhat यकीनन पकृति का हृदय स्थल लगता है। Netarhat पठार के निकट की पहाड़ियां सात पाट कहलाती हैं। जिनके नाम क्रमशः नेतरहताट पाट, पसेरी पाट, जोभी पाट, जमूडूरापाट तथा दासवानपाट आदि हैं।

    यहाँ के स्थानीय भाषा के अनुसार नेतरहाट का मतलब होता है ” बांस का बाजार (Market of Bamboo) “। इस इलाके के ग्रामीण बुजुर्ग बताते हैं कि बांस की इस क्षेत्र अधिकता होने के कारण इस स्थान का नाम नेतरहाट पड़ा। साथ ही साथ ये भी कहा जाता है की नेतरहाट शब्द की उत्पत्ति ” नेचर हाट ” से हुई है जो समय के साथ – साथ नेतरहाट शब्द में परिवर्तित हो गया।

    नेतरहाट / Netarhat के कुछ ख़ास स्थान –

    Netarhat में बहुत सारे जगह घूमने के लिए हैं जहाँ पर आप घूम सकते हैं।

    SL No.Place
    नेतरहाट आवासीय विद्यालय
    2मैग्नोलिया प्वाइंट / सनसेट प्वाइंट (Sunset 🌄 Point) 
    3सनराइज प्वाइंट (Sunrise 🌅 Point)
    4कोयल दृश्य बिंदु (Koyal View Point) 
    5नासपाती बागान
    6देवदार एवं चीड़ के जंगल
    7शैले हाउस ( Shaile House)
    8लोध फॉल / बूढ़ा घाघ जलप्रपात
    9नीचे घघरी जलप्रपात (Lower Ghaghri Fall)
    10ऊपर घघरी जलप्रपात (Upper Ghaghri Fall)
    11सदानी फॉल्स (Sadani Fall)
    12सुरकाई घाघरी जलप्रपात (Surkai Ghaghri Fall)
    13पलामू बंगला

    नेतरहाट आवासीय विद्यालय, नेतरहाट

    नेतरहाट आवासीय विद्यालय ( Netarhat Residential School ) को झारखंड की शान माना जाता है। ये विद्यालय अपने स्थापना काल से ही, पहले तो बिहार राज्य में और अब झारखंड राज्य में बोर्ड की परीक्षा (Board Exam) में प्रथम दस स्थान पाने वाले अधिकांश विद्यार्थी इसी विद्यालय से आते रहे हैं। बोर्ड की परीक्षा (Board Exam) के अलावा इस विद्यालय के विद्यार्थी राष्ट्रीय गणित ओलंपियाड (National Mathematics Champion) , राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा (National आदि परिक्षाओं में भी हमेशा आगे ही रहते हैं। 

    Netarhat - Queen of Chhotanagpur

    इंडियन पब्लिक स्कूल कांफ्रेस के संस्थापक सदस्य और ऋषि वेली स्कूल के प्राचार्य एफ. जे. पायर्स ने सन् 1951 ई. में इस विद्यालय की स्थापना की योजना बनाई थी। अंततः इस विद्यालय की स्थापना 15 नवम्बर 1954 ई. में हुई थी चार्ल्स नेपियर इस विद्यालय के प्रथम प्रधानाचार्य थे . पहले बैच में 60 Students को 1954 में छः वर्षीय पाठ्यक्रम के लिए प्रवेश दिया गया था। 1982 के बाद से लड़कों की संख्या को बढ़ाकर 100 कर दी गई।

    राज्य सरकार द्वारा स्थापित और गुरुकुल की तर्ज पर बने इस स्कूल में अभी भी प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर ही प्रवेश मिलता है। यहां 10-12 आयु वर्ग के बच्चों को ही प्रवेश दिया जाता है और लड़कों को उच्चतर माध्यमिक परीक्षा के लिए तैयार किया जाता है। यहां Class 6 & 9 में ही बच्चों को Admission लिया जाता है।

    मैग्नोलिया प्वाइंट (Magnolia Point)

    मैग्नोलिया प्वाइंट (Magnolia Point) जो कि सूर्यास्त (Sunset 🌄) के खूबसूरत नज़ारों के लिए जाना जाता है। कोहरे से सूर्योदय (Sunrise ⛅) भले ही बाधित हो लेकिन यहां का सूर्यास्त देखने लायक होता है। इस खूबसूरत जगह से आप ढलते हुए सूरज के आकर्षक दृश्य को देख सकते हैं। यहां पर जब आप ढलते हुए सूरज को देखेंगे तो पूरा आसमान नारंगी रंग का दिखाई देता है जो देखने में काफ़ी सुन्दर लगता है। इस जगह से आप ढलते हुए सूर्य को देखेंगे तो ऐसा लगेगा जैसे कि सूर्य इसी जगह नीचे घुस गया। 

    Netarhat - Queen of Chhotanagpur

    स्थानीय प्रशासन ने मैगनोलिया प्वाइंट को अच्छे से सजाया है जहाँ से आप सूर्यास्त का बेहतरीन नज़ारा देख सकते हैं। यदि आप इस जगह जल्दी पहुंचते हैं तो आप कुछ समय उस दृश्य बिंदु (View Point) पर बिता सकते हैं जहाँ से कोयल नदी को नीचे की हरी-भरी पहाड़ियों से गुजरते हुए देख सकते हैं।

    Netarhat से करीब 61 किलोमीटर की दूरी लोध जलप्रपात स्थित है। यदि जंगल-पहाड़ों के रास्ते से पैदल जाऐं तो सिर्फ 15 -17 किलोमीटर की दूरी ही तय करनी पड़ती है। मैगनोलिया प्वाइंट से भी दूर पहाड़ों से गिरती लोध जलप्रपात के पानी की तीन पतली धाराएं गिरती दिखाई पड़ती हैं । यह जलप्रपात लगभग 468  फीट की ऊंचाई से गिरती है।

    मैग्नोलिया प्वाइंट/ Magnolia Point का इतिहास / मैग्नोलिया प्वाइंट का नामकरण कैसे हुआ ?

    अंग्रेज ऑफिसर की बेटी (मैग्नोलिया) व चरवाहे की अधूरी प्रेम कहानी –

    स्थानीय कथाओं के अनुसार Netarhat का मौसम गर्मी के दिनों में इतना अच्छा रहता है जैसे हम किसी ठंडे परदेश में हों, जिसके कारण अंग्रेज ऑफिसर लोग अपने पूरे परिवार के साथ इस जगह पर छुट्टियां मनाने आते थे। कुछ ऑफिसर तो यहीं पर रहने लग गए थे। यहां पर एक अंग्रेज ऑफिसर (ब्रिटिश अधिकारी) की बेटी थी जिसका नाम था मैग्नोलिया और नेतरहाट गांव में ही एक चरवाहा था जिसका नाम था । मैग्नोलिया का Netarhat के चरवाहे के साथ मोहब्बत (Love) हो जाता है।

    चरवाहा Sunset Point 🌄 के आस – पास प्रतिदिन अपने मवेशियों को चराया करता था। मवेशी चराने के दौरान वह एक ऊंचा पत्थर पर बैठ जाता था और इसके बाद वह बांसुरी बजाता था। बांसुरी का आवाज़ इतनी सुरीली होती थी कि जो भी एक बार इसे सुन ले वो आवाज़ की ओर खींचा चला आता। 

    चरवाहे की बांसुरी के मधुर आवाज ने मैग्नोलिया के दिल को छू लिया। मैग्नोलिया मन ही मन वह बांसुरी बजाने वाले से प्रेम करने लगी। वह उसके प्यार में पागल सी हो गई, उससे मिलने के लिए बेकरार हो गई। मैग्नोलिया उसके बांसुरी का आवाज़ को सुनने के लिए अपने घोड़ा में बैठी और उस आवाज़ की ओर चल पड़ी तो ठीक सनसेट प्वाइंट के पास वो दिख गया। तो वे अपने घोड़ा से उतरी और उसके पास जाकर बैठकर बांसुरी की मधुर आवाज़ को सुनने लगी। इस तरह से हर रोज यहां पर चरवाहा उसे बांसुरी बजा कर सुनाता था।

    उन दोनों का हर रोज इस तरह मिलना – जुलना धीरे – धीरे प्यार में बदल गया और दोनों दिलों – जान से एक – दुसरे से प्यार करने लगे। मैग्नोलिया हर रोज भागकर उसके प्रेमी से मिलने के आया करती थी और दोनों घंटों – घंटों एक – दुसरे से बातचीत किया करते । कुछ दिनों बाद इसकी जानकारी मैग्नोलिया के पिता अंग्रेज ऑफिसर को मिली कि उनकी बेटी हर रोज उस चरवाहे से मिलने के लिए जाती है। तब उन्होंने चरवाहे को अपनी बेटी से दूर जाने को कहा लेकिन प्यार में डूबे उस चरवाहे ने दूर जाने से मना कर दिया। फिर वे अपनी बेटी को भी चारवाहे के साथ मिलने से माना किया लेकिन उसकी बेटी भी नहीं मानने लगी । 

    इतना बोलने के वाबजूद भी दोनों एक – दूसरे से मिलना नहीं छोड़ा तो गुस्से में आकर अंग्रेज अधिकारी ने उस चरवाहे की हत्या करवा दी। जब इसकी जानकारी मैग्नोलिया को हुई तब वह गुस्से से आग बबूला हो गई , इसके बाद वह अपने घोड़े के साथ उसी Sunset Point 🌄 के पास पहुंची और अपने घोड़ा सहित पहाड़ से कूद कर अपनी जान दे दी।

    Sunset Point 🌄 में वह पत्थर आज भी मौजूद है, जहां पर बैठकर चरवाहा बांसुरी बजाता था और मैग्नोलिया उस के पास बैठकर बांसुरी की मधुर धुन को सुना करती थी। इसी जगह पर मैग्नोलिया व चरवाहे की प्रतिमा स्थापित है, जो दोनों की प्रेम कहानी (Love ❤️ Story) की गवाही देती है। साथ ही इन दोनों के प्रतिमा के कुछ दूरी पर मैग्नोलिया के घोड़े की प्रतिमा भी बनाया गया है।

    सनराइज प्वाइंट (Sunrise 🌅 Point)

    हमलोगों में से कुछ ने भगवान हनुमान के बारे में एक लोकप्रिय कहानी (popular Story) तो सुनी ही होगी कि उन्होंने एक बार सूर्य को कोई एक सुंदर गोल फल समझकर निगल लिया था। लोगों का ऐसा मानना है कि जिस जगह उन्होंने सूरज को खाया यानी आपने मुंह में निगल लिया वह जगह कोई दूसरा नहीं बल्कि Netarhat ही था। 

    भगवान वीर हनुमान का जन्म हमारे झारखंड के गुमला जिले के अंजन गांव में हुआ था, जिसे आजकल अंजनी धाम के नाम से प्रसिद्ध है। इसके चलते लोगों को पुरा विश्वास हो जाता है कि नेतरहाट ही वो जगह है जहां पर ऐसा हुआ था। तो यह कहने की कोई जरूरत ही नहीं है कि नेतरहाट में सूर्योदय (Sunrise 🌅) और सूर्यास्त (Sunset 🌄) कितना सुंदर होता है, यहां पर ख़ुद भगवान भी अचंभित हो जाते थे। नेतरहाट में सूर्योदय देखने के लिए सूर्योदय बिंदु (Sunrise 🌅 Point) सबसे अच्छा है। 

    कोयल दृश्य बिंदु (Koyal View Point)

    शांति प्रेमियों (Silent Lover’s) के लिए कोयल दृश्य बिंदु (Koyal View Point) एक बहुत ही अच्छा जगह है। शहरों की भागदौड़ भरी ज़िन्दगी से दूर यहां के हरे-भरे घने जंगल से बहती हुई शांत कोयल नदी (Koyal River) का शानदार नजारा को देख सकते हैं।

    नाशपाती के बाग

    नाशपाती के बाग तो मानो नेतरहाट का शान है, इस जगह का नाशपाती खाने में काफ़ी मीठा होता है। इस जगह आने के बाद आप बिलकुल फ्री में नाशपाती खा सकते हैं । हां , अगर आप पैसा देने में सक्षम हैं तो यहां के किसानों तथा इसके देख-रेख करने वाले को आप इस फल का मूल्य अवश्य चुका दें। 

    देवदार एवं चीड़ के जंगल –

    देवदार एवं चीड़ के जंगल ऐसे सहायक वन हैं जो नेतरहाट की सुंदरता को और भी बढ़ाते हैं। इस वन के लंबे – लंबे चीड़ के पेड़ और देवदार के घने बाग इसे एक बेहतरीन जगह बनाते हैं। यहां पर आप फ़ोटो तथा वीडियो भी शूट कर सकते हैं, इसके लिए ये जगह काफ़ी अच्छा है।

    नेतरहाट में चीड़ के जंगल एक ऐसी जगह है जहाँ पर आप Adventure Tracking का भरपूर मजा ले सकते हैं। चीड़ वन में Tracking करना तथा यहां के प्राकृतिक नज़रों का आनंद लेना आपके लिए बेहद खास साबित हो सकता है। इस क्षेत्र में मौसम ज्यादातर ठंडा रहता है जो शहर की तुलना में काफी सुखद महसूस कराता है। 

    शैले हाउस (Shaile House) –

    शैले हाउस (Shaile House), नेतरहाट में लकड़ी से बना बंगला है जो कि उस समय का काफ़ी अच्छा बंगला माना जाता है। यह ब्रिटिश सरकार के द्वारा भारत के बंगाल प्रेसीडेंसी (President) के दौरान बिहार और उड़ीसा के लेफ्टिनेंट-गवर्नर “सर एडवर्ड अल्बर्ट गैट” (Lefitnent Governor “Sir Adward Albert Gait”) के शासन काल के दौरान बनाया गया था। जो – जो ब्रिटिश अधिकारी Netarhat को पसंद करते थे उसके लिए यह बंगला समर हाउस (Summer House) था।

    लोध फॉल / बूढ़ा घाघ जलप्रपात –

     लोध जलप्रपात झारखंड का सबसे ऊंचा जलप्रपात और पूरे भारत का 21वां सबसे ऊंचा जलप्रपात है। इस फॉल की विशेषता है कि फॉल में कई बूंदें हैं, जो पहाड़ियों के दोनों किनारों से एक के बाद एक कम दूरी के भीतर गिरती हैं। 

    Netarhat - Queen of Chhotanagpur

    इस फॉल का सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसकी गहराई का पता आज तक नहीं चल पाया है और बहुत कोशिशों के बावजूद कोई भी कभी भी गहराई को मापने में सफल नहीं होता है। लोध जलप्रपात नेतरहाट से 70 KM की दूरी पर स्थित है। 

    निचला घाघरी जलप्रपात (Lower Ghaghri Fall)

    निचला घाघरी जलप्रपात Netarhat से क़रीब 10 KM की दूरी पर स्थित है, जो कि काफ़ी घने जंगलों से चारों ओर से घिरा हुआ है। ये फॉल भी पहाड़ी से नीचे अपना रास्ता बनाकर आगे की ओर बढ़ने लगती है। निचला घाघरी झरना, नेतरहाट के प्रमुख पर्यटन आकर्षणों में से एक है जहाँ की यात्रा आपको अवश्य करनी चाहिए।

    निचला घाघरी झरना काफ़ी घने जंगल में स्थित एक ऐसी जगह है जहाँ पर लगभग 32 फीट ऊपर से पानी गिरता है। ये झरना जंगल के बीचों – बीच से अपना रास्ता बनाते हुए एक छोटी नदी के रूप में नजर आती है। इस झरने के दोनों किनारों पर पेड़ – पौधे भरे पड़े हैं जो इसे और भी ज्यादा खूबसूरत बनाते हैं। निचला घघरी जलप्रपात Netarhat से लगभग 10 किलोमीटर दूर पर स्थित है।

    ऊपर घघरी जलप्रपात (Upper Ghaghri Fall) –

    ऊपरी घाघरी एक छोटा सा जलप्रपात है जो नेतरहाट के Hill Station से महज़ 4 KM की दूरी पर स्थित है। घाघरी नदी लातेहार जिले में दो झरनों को जन्म देती है, अर्थात् ऊपरी घाघरी जलप्रपात और निचला घाघरी जलप्रपात। पतझड़ की मौसम में इस जगह पर पिकनिक मानना काफ़ी अच्छा होता है। ऊपरी घाघरी जलप्रपात भी Netarhat के प्रमुख आकर्षणों में से एक है। इस झरने के दोनों तरफ बहुत सारे पेड़ – पौधे भरे पड़े हैं जो कि इसकी खूबसूरती को दुगुनी कर देता है। हरी – भरी घाटी के बीच साफ़ नीला आकाश के नीचे स्थित यह एक खूबसूरत जगह है। इस जगह की यात्रा भी आपको जरुर करनी चाहिए। 

    सदानी फॉल्स (Sadani Fall) – 

    झारखंड के गुमला जिले में स्थित सदानी जलप्रपात कभी हीरे के भंडार का केंद्र हुआ करता था। सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के दौरान, इस स्थान पर कुछ दुर्लभ और बड़े हीरे का उत्पादन हुआ करता था। सदानी फॉल बिलकुल सांप की तरह दिखती है, जिसे दूर से देखने पर प्रतीत होता है कि पहाड़ियों से नीचे कोई सांफ फिसल रहा है। सदानी जलप्रपात, नेतरहाट से क़रीब 28 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 

    सुरकाई घाघरी जलप्रपात (Surkai Ghaghri Fall) –

     सुरकाई घाघरी जलप्रपात नेतरहाट के प्रमुख आकर्षणों में से एक है। ये फॉल भी जंगलों के बीचों – बीच पर स्थित है, इसके दोनों किनारे हरे – भरे पेड़ – पौधे से भरे पड़े हैं। नेतरहाट के पास अगर देखने के लिए सबसे अच्छी जगहों की खोज करते हैं तो आप इस जलप्रपात को भी अवश्य देखें। इस तरह से अछूते जलप्रपात को निश्चित रूप से अधिक से अधिक पर्यटकों के ध्यान की आवश्यकता होती है। ये फॉल लगभग Netarhat से 58 किमी की दूरी पर स्थित है।

    नेतरहाट का मौसम (Whether of Netarhat)  

    नेतरहाट का मौसम ग्रीष्मकाल यानि मार्च से जून के महीने में 25 से 30 डिग्री सेंटीग्रेड के बीच तापमान रहता है। बरसात का मौसम यानि जुलाई – अक्टूबर के महीने तक जारी रहता है। सर्दियों का मौसम यानि नवंबर से फरवरी के बीच होता है और तापमान 8 से 12 डिग्री सेंटीग्रेड तक गिर जाता है।

    नेतरहाट कैसे पहुंचें ?

    यह डालटनगंज से 117 किमी, रांची से 152 किमी, और लोहरदगा से 82 किमी से है।  

    By Air :- 

    • Nearest Airport – 
      • Birsa Munda International Airport, Ranchi – 155 Kilometres (3hr 47 min)

    By Train :- 

    • Nearest Railway Station –
      • Ranchi Railway Station – 153 Kilometres
      • Hatia Railway Station – 157 Kilometres

    By Bus :- 

    • Nearest Bus Stand –               
      • Khadgada (Kantatoli) Bus Stand, Ranchi – 155 kilometres 
      • Daltanganj Bus Stand – 117 kilometres
      • Gumla Bus Stand – 70 kilometres

    नेतरहाट, रांची घाघरा – नेतरहाट रोड रास्ते से पहुंचा जा सकता है। इसके सबसे सामने लोध फॉल पयर्टन स्थल है। नेतरहाट तक पहुंचने के लिए पर्यटक निजी वाहन किराए पर ले सकते हैं। जैसे – Taxi , Ola , Uber आदि।

    नेतरहाट / Netarhat घूमने का सबसे अच्छा समय –

     नेतरहाट घूमने का सबसे अच्छा समय मार्च से अप्रैल के महीनों में होता है, क्योंकि इस समय न तो ज्यादा गर्मी होती है और न ही ज्यादा ठंडा। हालांकि, अगर आप Winter ❄️ Lover हैं यानि सर्दियों का आनंद लेने के लिए जाते हैं तो आप नवंबर से फरवरी के महीनों के बीच जाइए ये सबसे अच्छा समय होता है। अगर आप Rainy Lover हैं तो आप जुलाई से सितम्बर के मानसून के महीनों के दौरान आप यात्रा कर सकते हैं हां लेकिन इस समय बहुत खतरनाक साबित हो सकता है अगर आप ध्यान से यात्रा नहीं करते हैं तो।

    नेतरहाट में सालों भर आते हैं पर्यटक –

    नेतरहाट में यूं तो सालों भर सैलानियों का आना-जाना होता है, लेकिन ख़ास तौर पर नवंबर से मार्च के महीना तक देश-विदेश के सैलानी यहां की मनोरम छटा देखने के लिए आते हैं। यहां पर सबसे अधिक सैलानियों को भाने वाला स्थान है Sunset 🌄 Point तथा Sunrise 🌅 Point । इसके अलावा यहां पर जलप्रपात, टेढ़े-मेढ़े रास्ते, रंग बिरंगे पक्षियों का संगम कहीं दूसरी जगह में भी देखने को नहीं मिलता है।

    विदेशों से भी आते हैं सैलानी –

    यहां पर हर साल पर्यटक के रूप में देश – विदेश से लोगों का आना – जाना लगा रहता है । इस बहुचर्चित नेतरहाट में सबसे अधिक कोलकता और मुंबई आदि से लोग आते हैं तथा इसके अलावा थाइलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया, जापान समेत कई देशों के सैलानी यहां पहुंचते हैं।

    नेतरहाट के होटल एवं रेस्टोरेंट वालों की चांदी – चांदी हो जाती है –

    सीजन के अनुसार यहां के होटल और रेस्टोरंट में काफी भीड़ बढ़ जाती है। देश-विदेश के सैलानी (Tourists) यहां की मनोरम वादियों का आंनद लेने के लिए कई दिनों तक यहां समय बिताते हैं। इसी कारण यहां के होटल एवं रेस्टोरंट मालिकों की चांदी – चांदी हो जाती है। इसके अलावा यहां के छोटे – छोटे दुकानदारों की भी बिक्री काफ़ी बढ़ जाती है। यहां के होटल संचालकों का कहना है कि हमलोगों की जीविका सैलानियों पर ही टिकी है। ये खूबसूरत जगह होने के कारण यहां पर सैलानी दूर-दूर से आते हैं। कई सैलानी तो Advance Booking कर देते हैं।

    नेतरहाट / Netarhat में क्या -क्या कमियां हैं ?

     झारखंड सरकार (Jharkhand Government) के पर्यटन विभाग Jharkhand Tourism Development Corporation (JTDC) की योजना के अनुसार, Netarhat को बहुत सारी सुविधाएं तो पहले से हैं । जैसे यहां पर KIOSK, Restaurants, Guests House, Toilet, Fast Food Stalls, Light House & Watch Tower (View Point) ये सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं। इन सारी चीजों को एक बार अच्छा से Repairing की जरूरत है ताकि यहां आने वाले पर्यटकों को कुछ दिक्कत ना हो।

    लोध जलप्रपात (Lodh Waterfalls) में क्या -क्या कमियां हैं ?

     झारखंड सरकार (Jharkhand Government) के पर्यटन विभाग Jharkhand Tourism Development Corporation (JTDC) की योजना के अनुसार, हिरनी जलप्रपात को बहुत सारी सुविधाओं की ज़रूरत है। जैसे यहां पर एक KIOSK, Restaurants, Guests House, Toilet, Fast Food Stalls, Light House & Watch Tower (View Point) लगना चाहिए।

    नेतरहाट जाने के पहले इन बातों को जरुर जानें – 

    • यहां पर जब जी जाते हैं आपने दोस्तों के साथ या आपने परिवारों के साथ जाएं , क्योंकि ये जगह समूह में जाने से वो मज़ा दुगुनी हो जाती है।
    • यात्रा का सबसे अच्छा समय मार्च – अप्रैल महीना के बीच है।
    • Picnic & Nature Advantures के लिए ये जगह काफ़ी अच्छी जगह है।
    • ज्यादा घने जंगलों में न जाएं और न ही ऊंचे चट्टानों पर चढ़ें।
    • वैसे तो देख रेख के लिए आदमी है फिर भी अपनी सुरक्षा खुद से करें।
    • रात को यात्रा करने से बचें , सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक अच्छा समय है।

    नेतरहाट / Netarhat जाते समय कहाँ ठहरें?

    होटल 🏨 (Hotel) –

    होटल प्रभात विहार डीलक्स जो कि झारखंड पर्यटन विकास निगम (Jharkhand Tourism Development Corporation ) (JTDC) द्वारा नेतरहाट में Sunrise 🌅 Point के पास संचालित एक होटल है। यह होटल लगभग सभी पर्यटन स्थलों और नेतरहाट बस स्टैंड के निकट है। इस होटल में आप Online Booking भी कर सकते हैं, इसके लिए आपको झारखंड पर्यटन (Jharkhand Tourism) की आधिकारिक वेबसाइट (Official Website) पर जाना होगा।

    डाक बंगला एक और होटल है जिसे Netarhat जाने के दौरान ठहर सकते हैं। ये होटल लातेहार पर्यटन (Lathehar Tourism) के द्वारा चलाया जाता है। इस होटल पर भी आप Online Booking कर सकते हैं, इसके लिए आपको लातेहार पर्यटन (Latehar Tourism) की आधिकारिक वेबसाइट (Official Website) पर जाना होगा ।

    तंबू ⛺ (Tent ) –

    झारखंड पर्यटन विकास निगम (Jharkhand Tourism Development Corporation ) (JTDC) के द्वारा ही ये सिस्टम चलाया जाता है। यहां पर पर्यटकों को एक अलग अनुभव देने के लिए स्विस कॉटेज टेंट (Swish Cottage Tent) की सुविधा भी प्रदान करता है। इसे भी आप Online Booking कर सकते हैं, इसके लिए आपको झारखंड पर्यटन (Jharkhand Tourism) की आधिकारिक वेबसाइट (Official Website) पर जाना होगा।

    निष्कर्ष :- 

    आज इस Article में विस्तार से बताया :- Netarhat कहां स्थित है ?, नेतरहाट का इतिहास क्या है ? नेतरहाट कैसे पहुंचे ?, नेतरहाट का मौसम कैसा रहता है ? , Netarhat के सामने कौन सा पर्यटन स्थल है ? तथा इसके अलावे अनेकों जानकारियां जो आपको जाननी चाहिए। 

    तो ये जानकारी आपको कैसी लगी आप हमें Comments में बता सकते हैं तथा पसंद आई तो अपने दोस्तों को भी Share कर सकते हैं। साथ ही साथ हमारी हर Post की जानकारी सबसे पहले पाने के लिए Subscribe Box में अपना Email Id डाल कर Subscribe कर सकते हैं। 

    FAQs

    Ranchi से Netarhat की दुरी कितनी है ?

    झारखंड की राजधानी रांची से 156 किमी पश्चिम में लातेहार जिले में नेतरहाट स्थित है।

    नेतरहाट का मतलब क्या है ?

    नेतरहाट शब्द की उत्पति मूलतः ‘नेतुर और हातु‘ शब्द के मिलने से हुआ है। नेतुर का अर्थ होता है बांस और हातु का मतलब बाजार

    नेतरहाट को कौन -कौन से नाम से जाना जाता है ?

    नेतरहाट को छोटानागपुर की रानी ( Netarhat – Queen of Chhotanagpur ) या ( Netarhat – The Hill Station of Jharkhand ) का नाम दिया है ।