सरहुल पर्व : आदिवासी और प्रकर्ति का अटूट रिस्ता
इस आर्टिकल मे पूरे झारखंड सहित पूरे भारत मे मनाया जाने वाला पर्व सरहुल के बारे मे बताया गया है और अधिक जानकारी के लिए आर्टिकल जरूर पड़े धन्यवाद l
सरहुल का अर्थ है प्रकृति के प्रति कृतज्ञता(gratitude) को प्रकट करना यह पर्व चैत्र मास के शुक्ल की तृतीया को मनाया जाता है जब पेड़ पौधो मे नए पुष्प, शाखाओ मे कोमल पत्ते, और पूरा जंगल मानो दुल्हन की तरह से सजी हो तब इस पर्व को मनाया जाता है l
इस वर्ष यह पर्व दिनांक-21-03-2026 को मनाया जाएगा
सरहुल पर्व की सुरुवात हजारो साल पहले से आदिवासी समाज द्वारा मनाया जा रहा है l

सरहुल पर्व की शुरुवात 1960 मे स्वर्गीय बाबा कार्तिक उराँव जी ने केंद्रीय सिरमटोली सरना स्थल से की थी, स्वर्गीय बाबा कार्तिक उराँव जी ने इस पर्व की शुरूवात आदिवासीयो की सामाजिक न्याय, एकता और आदिवासी पहचान संरक्षण के लिये की थी ।
आदिवासी समाज का पूरा जीवन काल प्राकृति पर ही निर्भर है जन्म से मृत्यु तक वह प्रकर्ति से ही सिखाता है,और प्रकर्ति को माँ ( सरना माँ, चाला आयो, सिंगबोनगा ) मानता है, इस कारण वह प्रकर्ति को आभार प्रकट करने के लिए सरहुल पर्व मनाता है l

इस दिन से नए साल का प्रारंभ मानते है , प्रकृति की पूजा, पर्यावरण संरक्षण, सामुदायिक एकता, संस्कृति और परंपरा, नववर्ष, मौसम की भविष्यवाणी के लिये मानाते है
आदीवासी समाज सरहुल पर्व मे सूर्य और धरती का विवाह करते है ,और इस दिन से नए साल का प्रारंभ मानते है
क्योंकि इस दिन से पेड़ पौधों मे फूल , नए पत्ती , और फल आते है l
सरहुल महोत्सव कहाँ मनाया जाता है?
प्रत्येक गाँव मे एक अखाड़ा होता है जहां पर सरहुल पर्व मानाया जाता है l आदिवासी अपने वेशभुसा में ढोल ,मांदर और नगाड़े के साथ अपनी लोकप्रिय सरहुल गीत और सरहुल नृत्य ”जादुर” करते है l
सरहुल पर्व मे साल या सखुवा के पेड़ की पूजा की जाती है, इस समय पर सखुवा के पेड़ से पुष्प आना प्रारम्भ हो जाता है ,कोमल पत्ते आना शुरू हो जाता है , इस सखुवा के पुष्प को सरहुल की दिन में कान में लगते है l
साल के पेड़ की पूजा -संथाल ,मुंडा, हो, उरॉव,आदि जनजातीया जो झारखंड , बिहार , छतीशगड,मध्यप्रदेश,पश्चिम बंगाल,और आसाम जैसे राज्यों मे आदिवासी जनजातियों द्वारा पूजा की जाती है l
मुख्य रूप से आदिवासी समाज अपने पुरखों और प्रकर्ति की पूजा करते है प्रकर्ति को ही ”सरना माँ” या ”सिंगबोनगा” या ”चाला आयो” मानकर प्रकर्ति की पूजा करते है l
सरहुल पर्व कितने दिनों तक मनाया जाता है?
सरहुल पर्व मुख्य रूप से 3 दिन तक मनाया जाता है पहले दिन नव युवक केकड़ा -मछली पकड़ने के लिए नदी ,तालाब मे जाते है l
दूसरे दिन बुजुर्ग या पाहन उपवास रखते है , पाहन दो घड़े लेकर नदी या कुँवा से पानी भरकर पवित्र सरना स्थल मे रखते है , फिर पाहन अपने विधि -विधान से 5 मुर्गा -मुर्गियों का बलि देता है और अपने पुरखों का स्मरण करता है l
तीसरे दिन अपने परिजनों , सगी -संबंदियों के साथ बलि मुर्गे -मुर्गियों का शेवन करते है l
इस आर्टिकल मे पूरे झारखंड सहित पूरे भारत मे मनाया जाने वाला पर्व सरहुल के बारे मे बताया गया है और अधिक जानकारी के लिए आर्टिकल जरूर पड़े धन्यवाद l