झारखंड का पाषाण वैभव: हजारों साल पुरानी सभ्यता के निशान - Anand Oraon

झारखंड का पाषाण वैभव: हजारों साल पुरानी सभ्यता के निशान 

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इस आर्टिकल मे झारखंड के पाषाण युग के पेंटिंग को दिखाया गया है

1.इस्को गुफा हजारीबाग-

यह पाषाण कलाकर्ति चित्र झारखंड के हजारीबाग के बड़कागाँव मे मोजूद है यह रॉक पेंटिंग 5000-10000 साल पुरानी मानी जाती है यह चित्र आज के कला चित्र सोहरई और कोहबर से मिलती है l इसकी खोज 1990 मे किया गया था l जब कोई भाषा या लिखना नहीं था और जब मानव गुफाओ मे रहा करते थे तब इस चित्र को बनाया गया था l यह रॉक पेंटिंग मेसोलेथिक युग के माने जाते l इस गुफा मे मानव ,पशु और शिकार की अक्रति का भरमार है , इसके साथ ही पक्षी , चंद्रमा ,सूर्य और कमल की चित्रकारी भी दिखने को मिलती है l इस चित्र मे ‘गिरू’ और ‘खगड़िया’ जैसे प्राक्रतिक रंगों का उपयोग किया गया है l 2.’चोकाहातू’ झारखंड का मगोलिथक –                                                   रांची से 80 km दूरी पर उपस्थित यह जगह मुंडा आदिवासी का हड़गड़ी (शामशाम घाट ) माना जाता है, इस जगह पर लगभग 8000 से अधिक शीलालेख है ,यह लगभग 8 एकड़ क्षेत्र मे फैला है l

यह शीलालेख लगभग 2500 से 3000 साल पुराने शीलालेख माने जाते है l

जीवित परंपरा –मुंडा आदिवशीयो द्वारा यह परंपरा हजारों सालों से आजतक चलती आ रहा है l

अपने एक अनूठी परंपरा जो हजारों सालों से चलते  आ रही है इस कारण चोकाहातू  का नाम UNESCO WORLD HERITAGE मे अंकित है l

3.झारखंड मे महापाषण युग के मेगालिथ –

पंकुरी बरवाडीह मे मेगालिथ या पत्थर की विशाल वेधशालाये है , जिनका उपयोग खगोलिये कामों के लिए भी किया जाता था l

यह मेगालिथ हर साल 21 मार्च और 23 सितंबर को , कई ग्रामीण , पर्यटक और शोधकर्ता ‘इक्विनॉक्स’ देखने के लिये आते है l

झारखंड की आदिवाशी संस्कृतिक मे  मर्तकों की स्मृति को संजाने की अदभुत परंपरा है l उरांव , मुंडा , हो , भूमिज , असुर और संताल जनजातियाँ पत्थर गाड़कर अपने पूर्वजों को श्रद्धनजलि देती है l यह न केवल आस्था का प्रतीक है , बल्कि झारखंड की मेगालीथिक विरासत को भी दर्शाती है l

यह परंपरा पर्यटकों के लिए सांसकृतिक खोज का आकष्रण है l

निष्कर्ष – झारखंड का यह इतिहास आज भी राज्य की वादियों और आदिवासी संस्कृतियों मे धड़कता है l ये पाषाण अवशेष इस बात के गवाह है की झारखंड की धरती का नाता हजारों साल पुरानी है l आज आवश्यकता इस बात की है कि हम आधुनिकता की दोड़ मे अपनी इस प्राचीन को न भूले l सरकार और समाज दोनों को मिलकर इन ऐतिहासिक स्थलों का संरक्षण करना चाहिए , ताकि पीढ़िया भी अपनी इस गौरवशाली और अनूठी पाषाण विरासत पर गर्व कर सके l करना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी इस गौरवशाली और अनूठी पाषाण विरासत पर गर्व कर सकें।

ANAND ORAON

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