मांग तेज हुई आदिवासी सरना धर्म कोड की

वो लोग जो किसी भौगोलिक क्षेत्र मे आदि काल से वास करते है, जिनकी पूरी जीवन शैली प्रकर्ति पर निर्भर है,जो जल-जंगल-जमीन को ही अपना सब कुछ मानते हैं , आदिवासी हैं, और अन्य धर्मों जैसे हिन्दू , मुस्लीम, सिख, ईसाई धर्म कोड़ के तरह अपने धर्म, संस्कृति पहचान के लिए आदिवासी या सरना धर्म कोड की मांग करते है l |
आदिवासी अन्य धर्मों से कैसे भिन्न है ?

- आदिवासी का मानना है की हम अन्य धर्मों की तरह न तो मूर्ति पूजक है और ना ही कोई ग्रंथ,बाइबल, कुरान की भांति कोई लिखित दस्तावेज है l
- आदिवासी प्रकार्ति के साथ-साथ अपने पूर्वजों को मानते है,प्राकर्तिक के इर्द-गिर्द ही इनका जीवन व्यतीत होती है ,आदिवासी का त्यौहार प्राकर्ति को समर्पित होती है l
- जन्म से लेकर मृत्यु तक पूरा रीति -रिवाज,परम्परा सब प्राकर्ति से उत्प्रेरित रहती है आदिवासी का प्रमुख त्यौहार -कर्म, सरहुल,बहा,जीतिया आदि इन कारणों से आदिवासी खुद को दूसरे धर्मों से अलग मानते है l
क्यों नहीं आदिवासी या सरना धर्म कोड लागू हो पा रहा है ?
- कई राज्यों मे आदिवासी बाहुल्य जगहों पर आदिवासी के हितेसी नाम पर कई पार्टी बनती है और चुनाव भी आदिवायो के समर्थन से जीतते है फिर भी कोड लाघू नहीं हो पा रहा है, यह पार्टी चुनाव जीतने के बाद आदिवसियों से किए वादे भूल जाते है , और सिर्फ अपने पार्टी के लिए काम करते l

- आदिवासी समाज मे एक जुटता नहीं है,समाज केवल अपने-अपने क्षेत्रीय धर्म को ही मानते है जैसे-झारखंड के आदिवासी जायदा तर सरना धर्म को मानते है वैसे ही बिहार के आदिवासी कोई और धर्म इसी प्रकार छतीसगढ़,पश्चिम बंगाल,मध्य प्रदेश उड़ीसा,असम,गुजरात आदि यह केवल अपने क्षेत्रीय धर्म, संस्कृति को ही जानते-मानते है इस वजह से भी l
- धर्मआन्तरण के कारण बहुत से आदिवासी अपनी धर्म संस्कृति को छोड़कर दूसरे धर्म को अपना लिए है l
- विश्व हिन्दू परिसद (RSS) आदिवासी को हिन्दू मानते है और आदिवासी कोड का पूरी तरह से विरोध करते है l
- केंद्र सरकार को कई बार आदिवासी कोड के लिए राज्य सरकार ने बिल पास किया परंतु केंद्र सरकार ने इसे खरिच कर दिया l
धर्म कोड लागू होने से आदिवासीयो को क्या लाभ होगा

- आदिवासीयो की विशिस्ट पहचान होगी
- आदिवासीयो की सही जनसंख्या की पहचान होगी
- सरकार द्वारा दी जाने वाली आरक्षण का लाभ होगा
- संस्कृति का सरक्षण होगा
- विशिष्ट पहचान होगा
- सटीक जनसंख्या का माप
- अस्तित्व की रक्षा
- धर्मंत्रण पर रो होगी
- भाषा और इतिहास का सरक्षण
निष्कर्ष :
आदिवासी समुदाय अपनी विशिष्ट पहचान , प्रकर्ति-पर आधारित संस्कृति और परंपराओ को हिन्दू , ईसाई या अन्य धर्मों से अलग मान्यता दिलाना चाहता है l
यह मांग उनकी सांस्कृतिक अस्मिता के सरक्षण और जंगरणना मे एक अलग कॉलम की मांग पर केंद्रित है l
2 Comments
ANAND ORAON · April 25, 2026 at 2:52 pm
सही बोले
“महुवा” झारखंड की पहचान और जनजातियों का सोना - Anand Oraon · April 25, 2026 at 9:20 am
[…] झारखंड में यह रोज़गार का एक बड़ा ज़रिया बनने की क्षमता रखता है। ग्रामीण समुदायों को महुआ इकट्ठा करने और उसकी प्रोसेसिंग में शामिल करके, उनके लिए रोज़ी-रोटी के स्थायी साधन बनाए जा सकते हैं। […]