इसको गुफा हजारीबाग
यह चित्र झारखंड के हजारीबाग के बड़कागाँव मे इस्थ है यह रॉक पेंटिंग 5000-10000 साल पुरानी मानी जाती है यह रॉक पेंटिंग मेसोलेथिक युग के माने जाते
झारखंड के मगोलिथक चट्टान
रांची से 80 km दूरी पर उपस्थित यह जगह् मुंडा आदिवासी का हड़गड़ी (शामशाम घाट ) माना जाता है, इस जगह पर लगभग 8000 से अधिक शीलालेख है ,यह लगभग 8 एकड़ क्षेत्र मे फैला है l
यह शीलालेख लगभग 2500 से 3000 साल पुराने शीलालेख माने जाते है l
झारखंड मे महापाषण युग के मेगलिथ
झारखंड मे महापाषण की एक जीवंत परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही है , जनहा मुंडा , हो , असुर , और उरॉव जंजातिया आज भी अपने मर्तकों के लिए ससदिरी (डॉलमेन ) और वरदिरी (मेनहिर )जैसे पत्थर के स्मारक बनाती है l
झारखंड की आदिवशी संस्क्र्ति मे मर्तकों की स्मति को संजोने की अदभुत परंपरा है l उरांव , मुंडा , हो , भूमिज , असुर और संताल जनजातियाँ पत्थर गाड़कर अपने पूर्वजों को श्र श्रद्धनजलि देती है l यह न केवल आस्था का प्रतीक है , बल्कि झारखंड की मेगालीथिक विरासत को भी दर्शाती है l
यह परंपरा पर्यटकों के लिए सांसकृतिक खोज का आकष्रण है
‘चोकहातू’ झारखंड का मगोलिथक
रांची से 80 km दूरी पर उपस्थित यह जगह् मुंडा आदिवासी का हड़गड़ी (शामशाम घाट ) माना जाता है, इस जगह पर लगभग 8000 से अधिक शीलालेख है ,यह लगभग 8 एकड़ क्षेत्र मे फैला है l
यह शीलालेख लगभग 2500 से 3000 साल पुराने शीलालेख माने जाते है l
दिन ढलने वाला था। डूबते सूरज की आखिरी किरणें, आंशिक रूप से बादलों से भरे आसमान से छनकर आ रही थीं। मेरे गाइड—जो सुबह से ही मुझे इस्को गाँव (जो अपनी प्रागैतिहासिक रॉक आर्ट के लिए मशहूर है) घुमा रहे थे—ने अपनी मोटरसाइकिल बरकागाँव के पास, पुंकरी बरवाडीह मेगालिथिक साइट के पास पार्क कर दी। यह जगह झारखंड के हज़ारीबाग से पच्चीस किलोमीटर दूर है। रोशनी इतनी थी कि मैं उन दो शानदार मेनहिरों (खड़े पत्थरों) की कुछ तस्वीरें जल्दी से खींच सकूँ।
उसी शाम, मैं सुभाषिस दास से मिला। वे एक स्वतंत्र शोधकर्ता हैं, जिन्होंने झारखंड के मेगालिथों (विशाल पत्थरों) का अध्ययन करने में दो दशकों से ज़्यादा समय बिताया है। ये मेगालिथ इस क्षेत्र के आदिवासी समुदायों द्वारा हज़ारों सालों से स्थापित किए जाते रहे हैं। उन्होंने मुझे समझाया कि एक मेगालिथ एक ‘जीवित इकाई’ होता है, और पुंकरी बरवाडीह साइट अब खत्म होने की कगार पर है।
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हज़ारीबाग में—जहाँ प्राचीन गुफाओं में मेसो-चालकोलिथिक (मध्य-ताम्रपाषाण काल) रॉक आर्ट मौजूद है, जो लगभग नौ हज़ार साल पुरानी है—कोयला खनन ने ज़मीन के स्वरूप को काफी हद तक बदल दिया है। उस जगह पर खड़े होकर, जहाँ दो झुके हुए मेनहिर मिलकर ‘V’ आकार बना रहे थे, मैं दूर से स्थानीय ‘नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन’ (NTPC) का प्लांट देख सकता था। दास ने मुझे बताया, “मेरे शोध से पता चला है कि पहाड़ियाँ होना एक अनिवार्य शर्त थी। उनके बिना, एक भी मेगालिथिक साइट स्थापित नहीं की जा सकती थी। इसलिए, यह समझना महत्वपूर्ण है कि उन प्राचीन समयों में लोगों ने पत्थरों को आस-पास की पहाड़ियों की चोटियों और उभारों के साथ कैसे संरेखित (align) किया था। लेकिन अब, दुख की बात है कि वह संरेखण बाधित हो गया है।”
रांची के एक पुरातत्वविद हिमांशु शेखर—जिनका डॉक्टोरल शोध मेगालिथों पर ही था—ने मुझे बताया कि हर मेगालिथिक साइट एक विशेष दिशा-विन्यास (orientation) का पालन करती है। यह दिशा-विन्यास उन कबीलों की मान्यताओं पर आधारित होता है, जिन्होंने उसे बनाया था। उदाहरण के लिए, छोटानागपुर पठार के मुंडा लोग ‘सासांदिरी’ (डॉल्मेन) को उत्तर-दक्षिण दिशा में स्थापित करते हैं। ऐसा वे समुदाय के उन सदस्यों की याद में करते हैं, जिनकी मृत्यु स्वाभाविक कारणों से हुई हो। वहीं, वे ‘बिरिदिरी’ (मेनहिर) को पूर्व-पश्चिम दिशा में स्थापित करते हैं—उन लोगों के लिए जिनकी मृत्यु अस्वाभाविक कारणों से हुई हो, या जिनका समाज में कोई विशेष दर्जा रहा हो। दास ने कहा कि पुंकरी बरवाडीह, अन्य आदिवासी कब्रिस्तानों जैसा नहीं है, बल्कि यह ‘आर्कियोएस्ट्रोनॉमी’—यानी प्रागैतिहासिक संस्कृतियों के खगोलीय ज्ञान के अध्ययन—के शोधकर्ताओं के लिए विशेष रुचि का विषय है, क्योंकि “इसके निर्माण में खगोल विज्ञान और गणित का उपयोग किया गया था।” उन्होंने आगे कहा कि ग्रेट ब्रिटेन और आयरलैंड में स्थित स्टोनहेंज और अन्य महापाषाण स्थलों की ही तरह, पुंकरी बरवाडीह का उपयोग भी “प्राचीन काल में वसंत और शरद ऋतु के विषुवों (equinoxes) को देखने के लिए किया जाता था।”

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