जब अंग्रेजो और साहुकारो का सता और अत्याचार फैलने लगा तब भारत के जंगलो मे एक चिंगारी उठी – बिरसा मुंडा ।
एक ऐसा नाम जिसने न केवल अंग्रेजो और साहुकारो के खिलाफ बगावत की बल्की जनजातिय समाज को जागरुक्ता , स्वाभीमान और एकता की राह दिखाई।
प्रारम्भीक जीवन
- जन्म-15 नवम्बर 1875 मे खूंटी के एक छोटे से गांव उलिहातु मे हुवा था |
- पिता का नाम – सूघना मुडा और माता का नाम- करमी मुडा था |
- बिरसा का बचपन एक साधारण आदिवासी लडको की तरह बिता , लेकिन उनके बचपन से ही आसाधण सोच और नेतृत्व की छमता थी ।
शिक्षा
प्रारम्भीक शिक्षा साल्गा गांव मे जयपाल नाग के मार्गदर्शन मे प्राप्त की थी, बिरसा ने जर्मन मिशन स्कूल मे पडाई की थी, वे पढने मे बहुत होसीयार थे लेकिन जल्दही यह महसूस की ब्रिटिश, आदिवासीयो को शिक्षा के माध्यम से ईसाइ धर्म मे परिवर्तित करना चाहते थे उन्होने वह स्कूल छोड दी।
समाजिकऔर धार्मिक सूधारक के रुप मे
- बिरसा ने आदिवासी समाज मे फैली कुरितीयां जैसे –अंधविशवास , शराबखोरी , के खिलाफ जागरुकता फैलाई।
- जिसका उधेश्य आदिवासियो की पारंपरिक मान्यताओं और परंपराओं को पुर्नजीवित करना था।
- उन्होने ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण के प्रयासों का विरोध किया ओर आदिवासी समुदाय को अपनी जडों से जुडे रहने के लिये प्रेरित किया.
- बिरसा ने समाज एक जूट करना सूरु किया और कहा-
” अबुवआ दिशुम,अबुआ राज ” (हमारा देश, हमारा शासन)
उलगुलान अंदोलन ( महाविद्रोह)
मूख्य स्थान : डूम्बारी बुरु की लडाई
- 24 दिसम्बर 1899 को बिरसा मुंडा ने डुम्बारी बुरु पहाड पर एक सभा की ।
- यह सभा एक क्रान्तीकारी एकत्रण थी, जहां बिरसा ने अंग्रेजो के खिलाफ खुले विद्रोह की घोसणा की ।
- जब अंग्रेजो को यह खबर मिली कि बिरसा लोगो जुटा रहे है और हथीयार बंद हो रहे है तो उन्होने हमला कर दिया
- डुम्बारी बुरु पहाड पर अंग्रेजो और आदिवासीये के बीची भारी झडप हुई।
- बिरसा के आनुयाईयो ने पारम्पारिक हथियारो ( तीर,धनुष,भाले ) से लडे जबकि अंग्रेजो के पास बन्दुके थी।
जनवरी 1900 अंग्रेजो और गांवोवालो के बीच लडाई तेज हो गई
- डूम्बारी बुरु की लडाई के बाद बिरसा ने अपने अनुयाईयो के साथ ब्रिटिश थानो,जमिदारो के घरो,और मिशनरीयो पर हमले शुरु किये
- लडी गई:-
- तमाड
- बुन्डु
- सोनाहातु
- खुटी और
- चाईबासा जैसे क्षेत्रो मे
- ईन झडपो मे छोटे समूहो मे लडाई होती थी ।
ब्रिटिश सरकार भयभीत हो उठी और इस अंदोलन को दबाने के लिये कडे कदम उठाये अंग्रेजो ने बिरसा के उपर 500 रुपये का इनाम रखा ।
गिरफतारी और बलिदान
3-जनवरी 1900 को चक्रधरपूर मे अंग्रेजो ने बिरसा को गिरफतार कर लिया । उन्हे रांँची के केन्द्रीय कारागार मे रखा गया, 9-जून को बिरसा की मृत्यु अंग्रेजो के द्वारा जहर दे कर कर दी गई ।
बिरसा की समाधि स्तल
30-जून 1900 को बिरसा मुंडा के मृत्यु के बाद उनके शरीर को आज के समय मे रांँची के डीसलरी पूल के समीपमे दफना दिया गया ।
दुर्भाग्य की बात है एक महान क्रान्तिकारी, स्वतंत्रत्ता सेनानी और आदिवासीयो के भगवान माने जाने वाले महापुरुष की समाधी स्थल “राष्ट्रीय स्मारक”
के रूप मे विकसित होना चाहिये वह आज भू-माफिया और जमीन दलाल के कब्जे का शिकार है।
भू-माफियाओ,जमीन दलाल षड्यंत्र से समाधि स्थल के उपरी सतह के मिट्टी की खूदाई और बिक्री कर दी है,
यह न सिर्फ एक ऐतिहासिक स्थल के साथ अन्याय है बल्कि जनजातिय भावनाव के साथ भी घोर अन्याय है,
झारखण्ड सरकार को इस ओर ध्यान देने की जरुरत है,और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करने की।
बिरसा मुण्डा का योगदान और सम्मान
झारखंड की पहचान आदिवासी समाज, संस्कृति और संघर्षों से जुड़ी है। बिरसा मुंडा आदिवासी अस्मिता और स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे बड़े प्रतीक हैं।
बिरसा मुंंडा का मुख्य उदेश्य आदिवासीयो की पहचान जल,जंगल,जमीन
पर उनके मलिकाना हक को वापस दिलाना था।
इसलिए उनके जन्मदिवस को सम्मान देने के लिए झारखंड की स्थापना उसी दिन (15 नवम्बर) को की गई। यह सिर्फ एक राज्य का निर्माण नहीं था, बल्कि एक आदिवासी पहचान और गौरव का सम्मान भी था।
निष्कर्ष
बिरसा मुण्डा ना केवल एक योधा थे , बल्कि एक युग निर्माता थे उन्होने आदिवासी समाज को उनकी पहचान , आत्मसम्मान और अधिकारो के लिए जागरुक किया आज भी वह एक प्रेणा के स्रोत है – खासकर उन लोगो के लिये जो अन्याय और शोसण के लिये अवाज उठाना चाहते है ।
उनका जीवन हमे सिखाता है सचाई , साहस और सघर्स कभी व्यर्थ नही जाता है





